Thursday, May 16, 2013

जानने के हक पर अंकुश की कवायद

निजता के बहाने जानने के अधिकार, मसलन सूचना के अधिकार पर अंकुश लगाने की कवायद तेज होती दिखार्इ दे रही है। हालांकि अधिकार के पर कतरने की शुरुआत तो तभी हो गर्इ थी, जब मनमोहन सिंह सरकार ने सीबीआर्इ को सूचना के अधिकार कानून के दायरे से बाहर कर दिया था।  प्रधानमंत्री ने केंद्रीय सूचना आयुक्तों के सातवें सम्मेलन में कहा है कि लोगों के जानने के अधिकार से अगर किसी की निजता का हनन होता है तो निश्चित रुप से इसका दायरा निर्धारित होना चाहिए, जिससे इसके निरर्थक प्रयोग पर प्रतिबंध लगे। क्योंकि जो जानकारियां व्यापक लोकहित की पूर्तियां करने वाली नहीं हैं, वे मानव संसाधन को क्षति पहुंचाने वाली हैं। प्रधानमंत्री की इस सिलसिले में यह चिंता तो समझ में आती है कि आरटीआर्इ का दुरुपयोग न हो, लेकिन इस बहाने कानून के पर ही कतर दिए जाएं, इस औचित्य को कतर्इ तार्किक नहीं ठहराया जा सकता ? वह भी तब, जब यह कानून आजादी के बाद एक ऐसा क्रांतिकारी कानून बनकर अपनी सार्थकता साबित कर चुका है।
आम नागरिक इसे कारगर हथियार के रुप में इस्तेमाल कर, भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ार्इ में सीधे आगे आकर लोकसेवकों और नौकरशाहों को जवाबदेही के लिए मजबूर कर रहा है।
सच कहा जाए तो सूचना का अधिकार विधायिका और कार्यपालिका की अटटालिकाओं में खोली गर्इ ऐसी इकलौती खिलाड़ी है, जो देश के आम नागरिक को जानने का हक देती है। लोकसेवकों और नौकरशाहों को पारदर्षी जवाबदेही सुनिश्चित करने को विवश करती है। लेकिन इस खुली खिड़की के दरवाजे बंद करने की कवायद लगता है, तेज होने जा रही है। सूचना के इस अचूक अस्त्र की धार शायद कुंद कर दी जाए। प्रधानमंत्री सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच जिस संतुलन को बनाए रखने की बात कर रहे हैं, निजता के उस अधिकार की रक्षा तो संविधान सम्मत है, किंतु इसके हनन का भ्रम पैदा करके लोकहित से जुड़ी जानकारियों को गोपनीय बनाए रखने की कोशिशों का क्या औचित्य है, यह समझ से परे है। इस तरह की मांग तब ज्यादा उठ रही है, जब सेवानिवृत्त नौकरशाहों और न्यायाधीषों की संख्या बतौर सूचना आयुक्त बढ़ी है। भारतीय प्रशासनिक व पुलिस सेवा के अधिकारियों की अपने कार्यकाल में हमेशा ही कोशिश रही है कि काले- कारनामों पर परदा पड़ा रहे। सीबीआर्इ को सूचना के अधिकार से मुक्त करके भी केंद्र सरकार ने यही साबित किया था कि वह भ्रष्टाचार से जुड़ी गड़बडि़यों पर परदा डाले रखना चाहती है। विदेशों में जमा काले धन की वापिसी में अंहम भूमिका की दरकार सीबीआर्इ से है, लेकिन अब सीबीआर्इ से कोर्इ आरटीआर्इ कार्यकर्ता यह जानकारी हासिल नहीं कर सकता कि वह इस बाबद क्या काला-पीला कर रही है। सीबीआर्इ के आरटीआइ से मुक्त होने के बाद विदेश और वित्त मंत्रालयों से जुड़े विभाग प्रमुखों का भी सरकार पर दबाव है कि उन्हें इस दायरे से मुक्त किया जाए। इसके लिए ये लोग अंतरराष्ट्रीय मामलों व शर्तों और प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के बाबत कंपनियों को दी जाने वाली रियायतों को सार्वजनिक करना नहीं चाहते। प्रवर्तन निदेशालय भी इस दायरे से छुटकारा चाहता है। ऐसे में विडंबना यह है कि देश के प्रधानमंत्री भी एक नौकरशाह हैं, लिहाजा नौकरशाह प्रधानमंत्री के रहते हुए आरटीआर्इ के नखदंत कब तक बचे रह सकते हैं ? वैसे भी केंद्रीय जांच ब्यूरो पर सूचना का अधिकार अधिनियम लागू न होने का फैसला संसद की मंशा की बजाए, सरकार के तब के सबसे आला अधिकारी रहे कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर की इच्छानुसार हुआ था। उन्होंने सेवानिवृत्त होने के ठीक एक दिन पहले इस सिफारिश पर सरकार का अंगूठा लगवा लिया था। यह सिथति सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अवेहलना तो थी ही, उन निर्वाचित सांसदों को भी ठेंगा दिखाना थी, जिन्होंने 2005 में संसदीय बहुमत से इस अधिकार को अधिनियम में बदला था। इस मनमानी से यह भी तय हुआ कि लोकतंत्र के शीर्शस्थ सदन लोकसभा और राज्यसभा से कहीं ज्यादा हैसियत देश के एक नौकरशाह में है।
न्यायालय और न्यायाध्ीश भी आरटीआर्इ के दायरे में आना नहीं चाहते। इन्हें दायरे में लाने की दृष्टि से मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर की थी। जिसका मकसद था कि इस कानून के तहत सुप्रीम व हार्इकोर्ट के न्यायाधीषों की पारिवारिक संपतित का ब्यौरा मांगा जा सके। लेकिन तत्कालीन न्यायमूर्ति केजी बालकृष्णनन ने इस मांग को इस दलील के साथ ठुकरा दिया था कि उनका दफतर सूचना के दायरे से इसलिए बाहर है, क्योंकि वे संवैधानिक पदों पर नियुक्त हैं। जबकि विधि और कार्मिक मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में न्यायपालिका को सूचना कानून के दायरे में लाने की सिफारिश की है। इस समिति ने यह भी दलील दी थी कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी लोकसेवक हैं, इसलिए सूचना का अधिकार उन पर लागू होना चाहिए। लेकिन यहां विडंबना है कि संसद न्यायपालिका को कोर्इ दिशा-निर्देश नहीं दे सकती और न्यायपालिका का विवेक मानता है कि वह सूचना के अधिकार से उपर है। यहां गौरतलब है कि जब यह अधिकार संसद पर लागू हो सकता है, तो न्यायपालिका पर क्यों नहीं ? यदि प्रजातंत्र में प्रजा सर्वोपरि है तो नागरिक को न्यायपालिका के क्षेत्र में जानकारी लेने का अधिकार मिलना चाहिए। यह तब और जरुरी हो जाता जब कोलकाता उच्च नयायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते, संसद में महाभियोग लाकर बर्खास्त किया जाता है। न्याय-प्रकि्रया को तो आरटीआर्इ से मुक्त रखा जाए, किंतु यदि किसी न्यायाधीश की संपतित में अनुपातहीन वृद्धि हुर्इ है तो उसे इस कानून के दायरे में लाना जरुरी है। अब यहां संकट यह है कि आरटीआर्इ को शिथिल करने की मंशा रखने वाली सरकार बिल्ली के गले में घंटी बांधने का जोखिम कैसे उठा सकती हैं ?
प्रधानमंत्री की यह दलील कतर्इ न्याय संगत नहीं है कि इससे निजी गोपनीयता का हनन और मानव संसाधन को क्षति पहुंच रही है। किसी अधिकारी की निजी गोपनीयता तो तब भंग होती, जब उससे इस कानून के तहत अंतरंग प्रसंग या घरेलू कि्रया-कलापों की जानकारी मांगी जाती ? संभव है, सवा अरब की आबादी में एकाध ऐसी बेहूदी मांग भी किसी ने की हो, लेकिन इसे बहुमत की मांग नहीं ठहराया जा सकता। और फिर ऐसी मांग पेश आर्इ भी है तो उसकी पूर्ति करना आरटीआर्इ में कहां बाध्यकारी है ? ऐसी अनुचित मांगों को ठुकराने का पर्याप्त अधिकार आरटीआर्इ में है। इसके उलट वास्तव में निजी हानि और मानव संसाधन की क्षति तो उन भंडाफोड़ करने वाले कार्यकत्ताओं की हुर्इ है, जिन्होंने जान जाखिम में डालकर जानने के अधिकार का सदुपयोग किया। सत्येन्द्र दुबे समेत अब तक 17 आरटीआर्इ कार्यकर्ता मारे गए हैं। क्या एकाध भ्रष्ट नेता या अधिकारी ऐसा है, जिसकी जानकारी मांगने पर जान जोखिम में आर्इ हो और परिवार को मानवीय क्षति का सामना करना पड़ा हो ? तय है, नहीं। भ्रष्टाचार से जुड़ा मामला जितना संगीन होता है, उससे जुड़े नेता, नौकरशाह और ठेकेदारों का गठजोड़ उतना ही शकितशाली होता है, इसलिए अव्वल तो पारदर्षिता से जुड़ी जानकारियां देने में टाला-टूली की जाती है और यदि जानकारी किसी बड़े घोटाले अथवा माफिया सरगना से जुड़ी है तो कार्यकर्ता के जान के लाले भी पड़ जाते हैं। इस लिहाज से कार्यकर्ताओं की सरुक्षा के लिए विहसलब्लोअर कानून को संसद में लाने की मांग भी उठ रही है। विधि आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने भी केंद्र सरकार से इस कानून को वजूद में लाने की पैरवी की है। लेकिन इस कानून को पारित होने में सबसे कानून को पारित होने में सबसे बड़ी बाधा कार्यपालिका है। वह जानती है कि आरटीआर्इ की छत्रछाया में वजूद में आए पूर्णकालिक इन भण्डाफोड़ कार्यकर्ताओं को कानूनी सुरक्षा मिल गर्इ तो सरकारी तंत्र को तो काम करना ही मुश्किल हो जाएगा। इसमें कोर्इ दो राय नहीं कि चंद पत्रकारों अथवा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सूचना अधिकार को प्रतिष्ठा व आजीविका हासिल करने का धंधा बना लिया है, लेकिन दुरुपयोग तो राजस्व, पुलिस व वन कानूनों का भी होता है, बावजूद ये कानून अमल में हैं। आरटीआर्इ का भी यदि कोर्इ बेजा इस्तेमाल करता है तो उस पर दण्डात्मक कार्यवाही के प्रावधान है, लेकिन फिर वही कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ?

Wednesday, October 26, 2011

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

आप सूचना का अधिकार कानून का इस्तेमाल करते हैं? क्या आपको मालूम है कि आप अपने पास के डाक घर से केन्द्रीय सरकार के दफ्तरों में सूचना अधिकारियों को बिना किसी डाक खर्च के अपना आवेदन, प्रथम अपील और दूसरी अपील कर सकते हैं?
मेरा अपना आकलन है कि ये डाक घरों के जरिये मुफ्त में सूचनाएं मांगने का आवेदन पत्र भेज सकते हैं, यह जानकारी देश के 0.5 प्रतिशत लोगों को भी नहीं है. यह संसद जानती है. देश भर के 4707 डाकघर के लोग जानते हैं. लेकिन जिनके लिए सूचना का अधिकार कानून बनाया गया है, वे नहीं जानते.

लोकतंत्र में संचार व्यवस्था का अध्ययन करें तो आप मजे में यह तथ्य जान सकते हैं कि ढेर सारी और विकराल संचार व्यवस्था है लेकिन लोगों के पास जरूरी सूचनाएं नहीं भेजने के तरीके भी मौजूद है. संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश करते हुए सरकार ने अपनी उपलब्धियों का आदतन एक खाका पेश किया. उसमें यह भी दावा किया गया ‘संचार विभाग ने 4707 केंद्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी बनाए हैं, जिनमें से देश की प्रत्येक तहसील में कम से कम एक अवश्य है.

कम्प्यूटरीकृत ग्राहक सेवा केंद्र के प्रभावी अधिकारी को विभाग के लिए केंद्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी के रूप में कार्य करने के लिए तथा उन केंद्रीय विभागों, संस्थानों की ओर से आरटीआई अनुरोध तथा अपील प्राप्त करने के लिए पहचाना गया है; जिन्होंने आरटीआई अधिनियम की धारा 5 (2) तथा 19 के अनुसरण में डाकघरों में यह सुविधा प्राप्त करने की सहमति दी है.

डाकघर में बनाए गए केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी आरटीआई अधिनियम की धारा 19 की उपधारा (1) के अंतर्गत केंद्रीय सरकार के विभागों व संस्थानों के केंद्रीय सूचना अधिकारी, वरिष्ठ अधिकारी अथवा केंद्रीय सूचना आयोग को भेजने के लिए आरटीआई अनुरोध और अपील प्राप्त करते हैं.

सूचना का अधिकार कानून के बनने के बाद समीक्षा यह की जानी चाहिए कि इस कानून की जानकारी देश के कितने प्रतिशत लोगों तक पहुंच पाई है और जिन लोगों तक नहीं पहुंच पाई है, उन तक इस कानून को कैसे पहुंचाया जाए. दूसरी बात कि मांगे जाने पर सूचनाएं देने में विभाग व अधिकारी किस-किस तरह की अड़चनें खड़ी करते हैं और उन अड़चनों को दूर करने की पहल सरकार को करनी चाहिए थी. इसके लिए सरकार महज एक विज्ञापन जारी करे और सूचनार्थी (सूचना मांगने वाला) से अड़चनों व बाधाओं के बारे में जानकारी मांगे तो उसे सूचना के अधिकार कानून के लागू होने का सच पता चल जाएगा.

तीसरी बात कि सरकार को यह कोशिश करनी चाहिए थी कि यह कानून और कैसे ज्यादा मजबूत हो. सरकार को इस कानून का इस्तेमाल करने वालों का दायरा बढ़ाने के लिए इस पहलू पर विचार करना चाहिए था कि देश का एक बड़ा हिस्सा जो अपनी गरीबी के कारण इस कानून का इस्तेमाल नहीं कर पाता है, वह कैसे इसका इस्तेमाल करे? देश में गरीबी रेखा के नीचे की पहचान और उसे कार्ड देने का सरकार का एक अपना फंडा है, सूचना का अधिकार कानून उस फंडे को लांघने की जरूरत जाहिर करता है.

सूचना के अधिकार कानून की कई ऐसी धाराएं हैं, जो अब तक लागू नहीं की जा सकी हैं. इनमें विभागों व संस्थानों द्वारा सूचना के अधिकार कानून की धारा 4(1) के तहत कानून लागू होने के 120 दिनों के अंदर अपनी ओर से विभाग से जुड़ी सूचनाएं लोगों को बताने के लिए कहा गया था. लेकिन आप केवल विभागों और संस्थानों की वेबसाइट देख लें, आपको यह अंदाजा लग जाएगा कि सरकारी विभाग व संस्थान किस हद तक आदतन सूचनाएं छुपाने की कोशिश करते आ रहे हैं.

इससे आगे सूचना के अधिकार कानून के लिए बने केंद्रीय सूचना आयोग लगातार कमजोर होता जा रहा है. जो उसके तेवर कानून बनने के कुछ दिनों के बाद तक दिखे, अब वह अनुभवी व वफादार नौकरशाहों का जमघट के रूप में दिखने लगा है. लगता है कि सरकार की मंशा यह है कि भारी-भरकम मशीनरी का एक ढांचा खड़ा भी दिखे और वह काम भी न करे. सूचना आयोग ने अपनी स्थिति यह बना ली है कि मांगी गई सूचनाएं न देने का फैसला करने वाले अधिकारियों व संस्थानों को साल-साल भर का मौका सूचनाएं न देने के लिए मिल जाता है.

सूचना आयोग में दूसरी अपील पर सुनवाई अदालतों की तरह कई-कई महीने बाद होने लगी है. छोटी-मोटी तकनीकी खामियों के आधार पर अपीलों को खारिज किया जाने लगा है. सूचना आयोग सूचना न देने वाले संस्थानों व अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने से या तो बचता है या फिर कार्रवाई नहीं कर पाता है. केंद्रीय सूचना आयोग के कुल निर्धारित पदों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत सूचना आयुक्तों के पद खाली हैं.

दरअसल, सूचना का अधिकार कानून को सरकार विज्ञापन की तरह इस्तेमाल करना चाहती है. वह केवल ‘शाइिनंग इंडिया’ की तरह दिखना चाहती है. इसीलिए वह अपनी उपलिब्धयों में इस कानून की तो गिनती करती है लेकिन इसकी जमीनी हकीकत से मुंह चुराती है. अभी तक इस कानून की पहुंच समाज के उस हिस्से तक ही हो पाई है, जो कानून का अपने हितों में इस्तेमाल करना जानता है. यह हिस्सा एक छोटे से मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग का है जो सत्तारूढ़ राजनीति व सरकारी दफ्तरों के इर्द गिर्द अपना व अपने जैसों का हित-अहित प्रभावित होते देखता है.

जाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति में जिस तरह की सूचनाएं मांगी जाएंगी, उससे सत्ताधारी पार्टी या पार्टयिां प्रभावित हो सकती हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस कानून को बाधा के रूप में पेश कर उन लोगों की इच्छाओं का सम्मान किया है जो इस कानून की वजह से अपना घाटा महसूस करते रहे हैं. प्रधानमंत्री जब कोई बात कहते हैं तो वह एक नीतिगत बात की तरह समाज में संप्रेषित होता है. लेकिन समाज में लोकतंत्र की चेतना अभी जिस स्तर पर पहुंच चुकी है, वहां सूचना के अधिकार जैसे कानून को कमजोर करने की कोई भी कोशिश राजनीतिक नुकसान के रूप में सामने आ सकती है.

इस तरह के कानून जब बनते हैं तो वह कई बार खुद को जख्म दे सकते हैं लेकिन लोकतंत्र में किसी कानून के सफल होने का मानदंड यह बनना चाहिए कि उसकी वजह से लोकतंत्र की चेतना का कितना विस्तार हुआ है. सूचना के अधिकार कानून को ज्यादा से ज्यादा उपयोगी बनाने की कोशिश, उसमें लोगों की ज्यादा भागीदारी से ही पूरी की जा सकती है.

केंद्रीय सूचना आयोग के लिए एक सूचना कार्यकर्ता सलाहकार समिति का भी गठन किया जाना चाहिए, जो सूत्रबद्ध तरीके से आयोग व सरकार को इस कानून के पूरी तरह लागू नहीं होने के छोटे-बड़े सभी अड़चनों की जानकारी दे सके.

Thursday, July 14, 2011

रिश्वत देने में अग्रणी संगठन

अक्सर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश में गरमागरम बहस चलती रहती है किन्तु मैं अनुभव करता हूँ कि भ्रष्टाचार की बहस में से मौलिक बात गायब है | सोम प्रकाश के मामले में हमारे सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रिश्वत मात्र अनुचित काम को करने के लिए ही नहीं दी जाती है अपितु उचित कम को जल्दी करवाने के लिए भी दी जाती है क्योंकि समय ही धन है| विवेकाधिकार भ्रष्टाचार को जन्म देती है|इससे निष्कर्ष निकलता है कि भ्रष्टाचार को कम करने के लिए समय सारिणी निर्धारित कर व विवेकाधिकार समाप्त कर इस बुराई पर नियंत्रण पाया जा सकता है|


दूसरी ओर देखें तो हमें ज्ञात होगा कि व्यापारी एवं उद्योगपति वर्ग ने अपने हितों की रक्षा के लिए संगठन बना रखें हैं| विभिन्न प्रकार की कर चोरी , बिजली चोरी आदि के मामलों में भी ये संगठन अपने सदस्यों का बचाव करते हैं| सदस्यों से मासिक या वार्षिक वसूली की जाती है जो संगठन के पदाधिकारियों द्वारा वाणिज्यिककर , आयकर , उत्पाद शुल्क ,चुंगी , बिजली विभाग, खाद्य सुरक्षा आदि के अधिकारियों को भेंट स्वरूप दे दी जाती है और एवज में इन अपराधियों को अभयदान दे दिया जाता है| किसी वस्तु विशेष पर कर आदि में मंत्रालय या सचिवालय स्तर से राहत के लिए भी यही सुगम मार्ग अपनाया जाता है| रिश्वत के इस खेल में लेने देने वाले दोनों पक्षकार सुरक्षित रहते हैं| सदस्यों को व्यक्तिगत मोलभाव नहीं करना पडता और अधिकारियों को वसूली के लिए जगह जगह नहीं जाना पडता है| व्यापारी एवं उद्योगपति वर्ग द्वारा दी गयी इन भेंटों को वस्तु/सेवा की कीमत में जोड़कर आम जनता से वसूल कर लिया जाता है|इस प्रकार रिश्वत का अंतिम भार जनता पर ही पडता है |
इसी प्रकार परिवहन के मामलों में भी ऑटो चालक अपने संगठनों के माध्यम से स्थानीय ट्रेफिक पुलिस को हफ्ता देते हैं| बड़े परिवहन संचालक संगठन भी परिवहन एवं पुलिस को एक मुस्त अभयदान शुल्क देते हैं|ट्रक ड्राईवर अपने पास डायरी रखते हैं जिसमें समय समय पर पुलिस को रास्ते में दी जाने वाली रकम का पुलिस के हाथ से ही इंद्राज करवाकर हिसाब मालिक को सौंप देते हैं| ऐसा नहीं है कि भ्रष्ट लोक सेवक पकडे ही नहीं जाते हों किन्तु सशक्त व प्रभावी न्यायिक व्यवस्था के अभाव में वे दण्ड से बच जाते हैं |

चूँकि अपराधियों को दण्ड देना न्याय तंत्र का कार्य है और वह अभी तक इसमें अपेक्षा तक सफल नहीं है| अतः देश के गुणीजनों व प्रबुद्ध वर्ग से मेरा प्रश्न है कि जब तक देश में यह विकलांग न्याय प्रणाली है और रिश्वत देने वाले संगठन कार्यरत हैं तब तक भ्रष्टाचार पर नियंत्रण का कौनसा मार्ग है और कोई भी लोकपाल कानून कितना कारगर होगा इसका भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है|भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए मात्र लोकपाल ही नहीं अपितु देश की न्यायिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन से मौलिक सुधार कर इसे ब्रिटिश काल से निकालकर विश्व स्तरीय बनाने की महती आवश्कता है |

Saturday, July 9, 2011

गोरे लोगों के काले कानूनों की मजबूत बेडियाँ

कानून और न्याय व्यवस्था का वैश्वीकरण


हमारे देश में विभिन्न सेवाओं के मानकीकरण व वैश्वीकरण की बात समय समय पर उठती रही है . किन्तु शताब्दियों पुराने अंग्रेजी कानूनों तथा उनके अधीन स्थापित न्याय व्यवस्था में कोई मौलिक परिवर्तन करने की इच्छाशक्ति का हमारे नेतृत्व में अभाव रहा है . नए मौलिक कानून नहीं बना कर शताब्दियों पुराने कानूनों में बार बार संशोधन करना समयातीत जीर्णशीर्ण कपडे की मरम्मत कर काम चलाने के समान है .जो कानून जिस देश , काल ,परिस्थितियों और शासन प्रणाली के लिए उपयुक्त थे वे सदैव उपयुक्त नहीं हो सकते . वैसे भी साम्राज्यवाद एकचक्रिय व विस्तारवादी धारणा पर आधारित है जबकि लोकतंत्र इसके विपरीत जनकल्याण के दर्शन की उपज है .आम व्यक्ति को प्रभावित करने वाले हमारे विद्यमान कानूनों की समसामयिक विदेशी कानूनों से तुलना करें तो हमें ज्ञात होगा कि हम सामान्य कानून तथा न्याय व्यवस्था में अंतर्राष्ट्रीय स्तर से बहुत पीछे हैं .फिर भी पूंजीपति वर्ग को प्रभावित करने वाले आयकर व कंपनी अधिनयम जैसे कानूनों में प्रतिवर्ष अनेक परिवर्तन किये जाते रहते हैं. हमारे लोक सेवक तथा न्यायालय आज भी साम्राज्यवादी अधिकारों का प्रयोग करते हैं जबकि जनता अभी भी जनतांत्रिक अधिकारों से वंचित है .यह सब इसलिए संभव है कि हमने अभी तक नए कानून बनाकर लोक सेवकों को दायित्व बोध नहीं कराया है तथा उनकी मनमानी स्वयंभू प्रक्रियाएं जारी हैं.
आज स्वतंत्रता के 64 वर्ष बाद भी राजपुरुष लोक सेवकों के अधिकारों में कोई कटौती अथवा दायित्वों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गयी है जिससे यह सन्देश मिलता है कि हमारा लोकतंत्र अभी भी लोकसेवकों के बंधक है .विधि निर्माण में अत्यंत चतुराईपूर्वक कूटनीतिक शब्दजाल का प्रयोग किया जाता है ताकि किसी सरकारी सेवक की कोई जिम्मेदारी नहीं बने . यद्यपि मणिपुर राज्य की लोकप्रिय सरकार ने लोक सेवक दायित्व अधिनियम ,2006 बनाकर लोक सेवकों का दायित्व निर्धारित करने का प्रावधान किया है और अन्य सभी राज्य सरकारों व केन्द्र सरकार को ऐसा कानून बनाकर स्थित पर नियंत्रण पाना चाहिए .


हमारी व्यवस्था में किसी भी अधिकारी को दायित्वधीन बनाये जाने से परहेज किया गया है . हमारे यहाँ मुख्य न्यायाधिपति को कहीं भी जिम्मेदार नहीं बताया गया है . इंगलैंड में न्यायालय अधिनियम,2003 की प्रथम धारा में ही कहा गया है कि लोर्ड चांसलर (सुप्रीम कोर्ट का मुखिया) न्यायालयों के प्रभावी एवं दक्षतापूर्वक संचालन सुनिश्चित करने के कर्तव्याधीन है तथा वह अपने कर्तव्य निष्पादन की रिपोर्ट प्रतिवर्ष दोनों सदनों के समक्ष रखेगा व धारा 58 के अनुसार न्यायालयों के लिए वहाँ अलग से स्वतंत्र निरीक्षणालय स्थापित है . हमारी प्रणाली में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को अधीनस्थ न्यायालयों पर न्यायिक एवं निरीक्षक दोनों वरिष्ठता प्राप्त है अतः निरीक्षण प्रणाली का कोई उपयोग व महत्व नहीं रह जाता है .किसी भी निकाय के सुचारू कार्यरत होने के लिए निरीक्षण एवं प्रशासनिक इकाई का अलग अलग होना आवश्यक है. निरीक्षण हमेशा अचानक होना चाहिए तथा पूर्व नियोजित निरीक्षण से स्वयं निरिक्षण का औचित्य समाप्त हो जाता है . न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए यह भी समान रूप से आवश्यक है कि इंग्लॅण्ड की भांति स्वयं न्यायपालिका का प्रशासनिक खंड, कम से कम हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट स्तर पर, न्यायिक कृत्यों से अलग एवं स्वतंत्र हो .यदि एक ही अधिकारी के पास न्यायिक एवं प्रशासनिक दोनों शक्तियां केंद्रित हों तो उनके प्रयोग पर प्रश्न चिन्ह लग सकता है .

इंग्लॅण्ड में आपराधिक प्रक्रिया नियम 2010 के नियम 3.2 के अंतर्गत अदालत के कर्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि मामले की शीघ्र प्रगति के लिए एक समय सारिणी बनायीं जायेगी दूसरी ओर हमारे यहाँ स्वयम्भू प्रक्रिया अपनाकर मामले को अनिश्चित काल के लिए स्थगित करने हेतु “उचित समय पर” (Due Course) में डाल दिया जाता है जबकि ऐसे अस्पष्ट शब्दों का प्रयोग किसी नियम में नहीं है और संविधान के अनुसार किसी भी न्यायालय को सरकार की सहमति के बिना/कानून से असंगत प्रक्रियागत नियम बनाए का कोई अधिकार नहीं है .इस प्रकार संसद द्वारा बनाये गए कानूनों को भी प्रशासनिक आदेश की आड़ में निष्प्रभावी बनाना हमारे न्यायतंत्र के लिए बांयें हाथ का काम है . दूसरी ओर उस “उचित समय पर” में डाल दिये गए प्रकरण से बाद में दर्ज प्रकरणों में भी कुछ अपवित्र कारणों से पहले निर्णय दे दिए जाते हैं. न्यायालयों द्वारा इस प्रकार अनुच्छेद 14 द्वारा गारंटीकृत विधि के समक्ष समानता के अधिकार का खुला उल्लंघन किया जाता है और ऊपरी न्यायालय, जिन पर संविधान (अनुच्छेद 227)तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता(धारा 483)के अंतर्गत पर्यवेक्षण का दायित्व डाला गया है, मूकदर्शक बने रहते हैं.
विधि का अच्छा शासन कहता है कि आपवादिक परिस्थितियों को छोड़कर प्रकरणों का निपटान उनके दर्ज होने के वरीयता क्रम में हो .हमारी न्यायिक व्यवस्था में जवाबदारी का पूर्णतया अभाव है व पुनरीक्षण तथा मूल मामले दोनों के निपटान में समान समय लिया जाता है जबकि दोनों के लिए वांछित समय व श्रम में 1 व 30 का अनुपात हाई कोर्ट द्वारा माना गया है . वकीलों द्वारा स्थगन की मांग इसके लिए कोई स्वीकार्य बहाना नहीं हो सकता क्योंकि न्याय प्रशासन न्यायाधीशों का कार्य है जिसके लिए उन्हें जनता के धन में से भुगतान किया जाता है ,न कि वकीलों का और वे इसके लिए जिम्मेदार हैं.

हमारे न्यायालयों की प्रक्रिया खुली होकर भी गुप्त है क्योंकि एक गैर पक्षकार को किसी मामले का निरीक्षण आपवादिक परिस्थितियों में ही अनुमत है जबकि अमेरिका में न्यायिक अभिलेख इन्टरनेट पर ही उपलब्ध है और इंग्लॅण्ड में सुप्रीम कोर्ट नियम 2009 के नियम 39 (3) में प्रावधान है कि रजिस्ट्री द्वारा धारित सभी प्रलेख प्रेस अथवा जन सामान्य द्वारा निरीक्षण किये जा सकेंगे किन्तु राष्ट्रीय सुरक्षा, जन हित अथवा वाणिज्यक गोपनीयता के कारणों से रजिस्ट्रार मना कर सकेगा . अर्थात हमारे यहाँ निरीक्षण अपवाद है जबकि इंग्लॅण्ड में मनाही आपवादिक मामलों में ही की जा सकती है . अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाहियों की साथ साथ इलेक्ट्रोनिक रिकॉर्डिंग होती है तथा वह इन्टरनेट पर भी उपलब्ध रहती है .इंगलैंड की न्यायप्रणाली में बड़ी पारदर्शिता है तथा वहाँ मात्र सरकारी रिपोर्टें ही नहीं अपितु निजी संगठनों द्वारा किये गए सम्बंधित सर्वेक्षणों के विवरण स्वयं न्याय मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है. इंग्लॅण्ड में सूचना के अधिकार को पर्याप्त महत्व दिया गया है तथा यह न्याय मंत्रालय का विषय है . इंग्लॅण्ड में सुप्रीम कोर्ट नियम 2009 एक सरल 19 पृष्ठीय प्रलेख है जबकि हमारे सुप्रीम कोर्ट नियम ,1966 जटिल 200 पृष्ठीय प्रलेख है .
हमारे यहाँ विधि आयोग मात्र एक राजकीय आदेश से स्थापित निकाय है जिसके दायित्व , अधिकार या उपयोग किसी संसदीय अधिनियम द्वारा परिभाषित नहीं हैं .स्मरण रहे कि वर्ष 1964 में स्थापित हमारा केन्द्रीय सतर्कता आयोग भी वर्ष 2003 से पूर्व इसी प्रकार बिना संसदीय कानून के कार्यरत निकाय रहा है . हमारे यहाँ विधि आयोग, राष्ट्रीय पुलिस आयोग आदि अपनी रिपोर्टें सम्बंधित मंत्रालय को प्रस्तुत करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं . जब तक शासन में पारदर्शिता अपनाते हुए इन रिपोर्टों पर की गयी कार्यवाही , मानी अथवा न मानी गयी सिफारिशों से संसद के माध्यम से जनता को अवगत नहीं कराया जाता तब तक इन कमेटियों , आयोगों पर होने वाला व्यय जनता के दृष्टिकोण से अपव्यय है और ये रिपोर्टें रद्दी कागज के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकती .इसके विपरीत इंग्लॅण्ड में विधि आयोग 1965 के विधि आयोग अधिनियम द्वारा स्थापित एक निकाय है तथा धारा 3 क के अनुसार विधि आयोग के प्रस्तावों के मानने के सम्बन्ध में संसद के दोनों सदनों के समक्ष रिपोर्टें प्रस्तुत की जाती हैं. हमारे देश में भी संसदीय अधिनयम बनाकर विभिन्न कमेटियों एवं आयोगों की कार्यप्रणाली पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है .इनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों पर सम्बंधित मंत्रालय द्वारा 30 दिन के भीतर प्रस्तावों के मानने के सम्बन्ध में संसद के दोनों सदनों के समक्ष रिपोर्टें प्रस्तुत की जानी चाहिए

Sunday, February 20, 2011

सूचना का अधिकार (RTI) वर्तमान स्थिति एवं चुनौतियाँ

सरकार, सरकारी योजनाएँ और तमाम सरकारी गतिविधियाँ हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । आम आदमी से जुड़े कई मामले प्रशासन में बैठे भ्रष्ट, लापरवाह या अक्षम कर्मचारियों/अधिकारियों के कारण फलीभूत होने के बजाय कागज का पुलिंदा बनकर रह जाती है । सन्‌ १९४७ में मिली कल्पित आजादी के बाद से अब तक हम मजबूर थे । व्यवस्था को कोसने के सिवाय
कुछ नहीं हैं, क्योंकि आज हमारे पास ‘सूचना का अधिकार’ (RTI) नामक औजार है, जिसका प्रयोग करके हम सरकारी विभागों में अपने रूके हुए काम आसानी से करवा सकते हैं । इस हेतु हमें ‘सूचना का अधिकार अधिनियम २००५’ की बारिकियों को ध्यानपूर्वक समझना और समझाना होगा । सामाजिक क्षेत्र में यह कानून ग्राह्य हो, इसके लिए बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, महिलाओं, युवाओं के विशेष रूप से जागरूक किए जाने की आवश्यकता है । भगत सिंह ने क्रांति को जनता के हक में सामाजिक एवं राजनीतिक बदलाव के रूप में देखा था । सूचना का अधिकार (RTI) को हल्के अंदाज में न लेकर एक बड़े आंदोलन के रूप में देखें, सोंचे एवं मूल्यांकन करें तभी वास्तव में इसकी सार्थकता सिद्ध होगी । ६३ साल पूर्व मिली आजादी वास्तव में सत्ता के अदला-बदली की औपचरैकता भर बनकर रह गई । शोषितों का शोषण नहीं रूक बल्कि आम आदमी की परेशानियाँ और बढ गई । आज ज्यादातर लोग प्रशासन/व्यवस्था को मन ही मन गाली देकर अपनी भड़ास निकल लेते हैं, परन्तु क्या इससे कुछ समाधान मिल सकता है । समाधान हेतु व्यक्‍ति को व्यवस्था परिवर्तन का अंग बनकर उस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने हेतु तत्पर होना पड़ेगा । क्या है सूचना का अधिकार अधिनियम २००५? ःइस अधिनियम के तहत आवेदन करके हम किसी भी विभाग से कोई भी जानकारी माँग सकते हैं और अधिकारी/विभाग माँगी गई सूचना को उपलब्ध करवाने के लिए बाध्य है, बशर्ते वह सूचना माँगने के तरीके की शैली में हो । यही बाध्यता/जबाबदेही ना केवल पारदर्शिता की गारंटी है, बल्कि भ्रष्टाचार के उन्मूलन का तथ्य भी निहित है । वास्तव में यह अधिनियम आम आदमी के लिए आशा की किरण नहीं बल्कि आत्मविश्‍वास भी लेकर आया है । इस औजार रुपी अधिनियम का प्रयोग करके हम अपनी आधी-अधूरी आजादी को संपूर्ण आजादी बना सकते हैं । इस संपूर्ण आजादी को पाने के लिए अधिनियम
को गहराई से अध्ययन कर ज्यादा से ज्यादा लोगों को जागरूक कर संपूर्ण क्रांति का शंखनाद करना पड़ेगा । सूचना का अधिकार करेगा क्रांति का शंखनाद ःभगत सिंह ने कहा था- हमारी लड़ाई, हमारी कमजोरियों के खिलाफ है । हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्‍वास करते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्‍ति को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके । क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और विद्रोह तो सिर्फ मालिकों के परिवर्तन द्वारा सड़ाध को ही आगे बढ़ाते हैं । लोगों के परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है । क्रांति एक ऐसा करिश्‍मा है, जिससे प्रकृति भी स्नेह करती है, क्रांति बिना सोची-समझी हत्याओं और आगजनी की दरिन्दगी भरी मुहिम नहीं है और न ही क्रांति मायूसी से पैदा हुआ दर्शन ही है । वास्तव में भगत सिंह के विचारों को जीवन में आत्मसात कर क्रियान्वित किए बिना क्रांति संभव नहीं । वैचारिक क्रांति/आंदोलन को धार देने के साथ-साथ उस हेतु समयबद्ध कार्यक्रम व दूरदर्शी योजना बनानी होगी तभी हम सफल हो सकते हैं और अपने अधिकारों को पा सकते हैं । दूसरे के कंधों पर बंदूक रखकर चलाने के बजाय हमें स्वयं को प्रशिक्षित करना चाहिए । जिंदगी के आम जरूरत की तरह आगे आनेवाले समय में सूचना का अधिकार (RTI) भी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता की श्रेणी में आ जाएगी । सामाजिक परिवर्तन सदा ही सुविधा संपन्‍न लोगों के दिलों में खौफ पैदा करता रहा है । आज सूचना का अधिकार धीरे-धीरे ही सही परन्तु लगातार सफलता की ओर बढ़ रहा है । पुरानी व्यवस्था से सुविधाएँ भोगनेवाला तबका भी इस अधिनियम का पैनापन खत्म करने की कोशिश में प्रारम्भ से ही रहा है । कुछ सूचना आयुक्‍तों का रवैए से इस कानून का बंटाधार होने
की आशंका भी प्रबल हो गयी है । सूचना का अधिकार से जुड़े हुए कार्यकत्ताओं का उत्पीड़न अभी भी जारी है और केन्द्रीय सूचना आयोग, केन्द्र एवं राज्य सरकार उन कार्यकर्त्ताओं को पूर्णसुरक्षा देने, बेवजह तंग होने से बचाने में असमर्थ है । इस हेतु उनकी कोई नीति/नियमावली ही नहीं है । कई महीनों इंतजार के बाद भी माँगी गई सूचनाएँ नहीं मिलती या फिर अधूरी और भ्रामक मिलती है । उसके बाद भी यदि कोई आवेदक, सूचना आयोग में जाने की हिम्मत भी करता है, तब भी कई आयुक्‍त तो प्रशासन के खिलाफ कोई कार्रावाई नहीं करते । स्थिति ऐसी है कि हम तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी उसी जगह खड़े है, जहाँ कई दशक पहले खड़े थे । क्रांतिकारियों की कुर्बानियाँ बेकार हो रही है जिनके लिए आजाद हिंदुस्तान से आजादी के बाद वाला हिंदुस्तान ज्यादा महत्वपूर्ण था । क्या उन क्रांतिकारियों को दी गई यातनाएँ नहीं झुका पाई? हमारा उत्पीड़न या कोई भी असफलता क्या हमारे इरादों को तोड़ सकती है, यह यक्षप्रश्न आज हमारे समक्ष खड़ा है ? सूचना का अधिकार से जुड़े कार्यकर्त्ताओं को इस अधिकार को और अधिक मजबूती से प्रयोग करने एवं इसके पूर्ण सशक्‍तिकरण गेतु संगठित एवं आंदोलित होना चाहिए । देश हमारा है, सरकार भी हमारी है, इसलिए अपने घर को साफ रखने की जिम्मेवारी भी हम सबकी है । इसलिए हमें अपने अधिकार की रक्षा हेतु अपने कर्तव्यों का पूर्ण पालन करना चाहिए । क्या है (RTI) की कमियाँ?पुरानी कार्य-संस्कृति, पुरानी सोंच, प्रशासनिक उदासीनता एवं बाबूशाही शैली में कार्य करनेवाले लोगों में इस एक्ट को लेकर काफी बेचैनी है, और इस तरह के लोग (RTI) को अंदर ही अंदर को सटे रहते हैं । इसके कारण ७० प्रतिशत आवेदकों को ३० दिनों में कोई सूचना नहीं मिली । यदि मिली भी तो ३० प्रतिशत को ही सूचना मिली और वह भी गलत, अपूर्ण या भ्रामक । आरटीआई में ऐसा कोई मैकेनिज्म ही नहीं बनाया गया जिससे यह पता चल सके कि किस आवेदक को सूचना मिली या नहीं मिली और नाही संबंधित विभाग । सेक्शन माँगी गई सूचना के जबाब की प्रतिलिपि ही आरटीआई सेल में देने की नैतिक जिम्मेदारी ही पूरी करते हैं । आरटीआई सेल में कर्मचारियों की भयंकर कमी है । आरटीआई के तहत आवेदकों का ढेर लगता जा रहा है, परन्तु कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने हेतु प्रशासन का रवैया उदासीन है, जो गंभीर एवं सोचनीय है । आरटीआई के सूखी सीट पर आने के लिए कर्मचारी तैयार ही नही होते और जो कर्मचारी इस सेल में आने के लिए उत्सव भी हैं उन्हें विभिन्‍न कारणों से यहाँ लगाया ही नहीं जाता । जन सूचना अधिकारियों के समक्ष काम का अत्यधिक बोझ है । सूचना अधिकारियों को अपने दैनिक कार्य के साथ-साथ आरटीआई का काम भी देखना पड़ता है और इसी दोहरे बोझ की वजह से आरटीआई का कार्य प्रभावित होता है । ज्यादातर विभागों में आरटीआई सेल में कोई कोऑर्डिनेटर ही नहीं है, जिससे यह सुनिश्‍चित हो सके कि आवेदक को ३० दिनों के भीतर और सही सूचना प्राप्त हुई अथवा नहीं । क्या इस ओर प्रशासन/सरकार की नींद कभी टूटेगी या ऐसी ही चलेगा?
सूचना का अधिकार कानून की विशेषता :१. सूचना का अधिकार के तहत जमा किए गए आवेदक का उत्तर ३० दिनों के अंदर देना आवश्यक है अन्यथा प्रतिदिन की देरी के हिसाब से २५० रू० मात्र का जुर्माना देना पड़ सकता है । २. इस कानून के तहत आप सरकारी निर्माण कार्यों का मुआयना भी कर सकते हैं । ३. अब आप सरकारी निर्माण में प्रयोग की गई चीजों का नमूना भी माँग सकते हैं।४.किस अधिकारी ने फाईल पर क्या लिखा है, कि जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं अर्थात्‌ इस अधिकार का प्रयोग करके आप फाईल नोटिंग्स की प्रतिलिपि भी ले सकते हैं ।
शिकायत भी कम नहीं : १. आवेदकों को सूचना का अधिकार के तहत आवेदन जमा करवाने तक के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है ।२. सूचना आयोग में कानून का कड़ाई से पालन नहीं करने से सरकारी अफसर अपनी मनमानी कर रहे हैं । छोटे-मोटे मामलों में तो सूचनाएँ मिल भी जाती है परन्तु नीतिगत मसलों, बड़ी योजनाओं या फिर जहाँ किसी भ्रष्टाचार का अंदेशा हो तो सरकारी अधिकारी चुप्पी साध लेते हैं । ३. सूचना का अधिकार का प्रचार-प्रसार स्वयंसेवी संस्थाओं या फिर कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा ही किया जा रहा है । सरकार अपनी ओर से इस कानून के प्रचार की कोई जिम्मेवारी नहीं निभा रही है । सरकार इस अधिकार के प्रचार-प्रसार में कोई रूचि नहीं ले रही है । उदाहरणस्वरूप २००६-०७ के दौरान प्रिंट मीडिया को १०९ करोड़ रूपया और इलेक्ट्रानिक मीडिया को १०० करोड़ रूपया का विज्ञापन किया गया परन्तु उनमें से एक भी विज्ञापन सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के लिए नहीं था । ४. इस अधिनियम के तहत तमाम सरकारी विभागों को जनसूचना अधिकारी तो नियुक्‍त करवा दिए परन्तु सूचना अधिकारियों को आवश्यक सुविधाएँ नहीं दी । कई विभागों में तो आरटीआई के बारे में प्रशिक्षण भी नहीं दी गई है । कहीं-कहीं आरटीआई सेल को कमरा भी उपलब्ध कराया गया है । ५. सूचना आयोग में भी अदालतों की तरह केसों का ढेर लगता जा रहा है । किसी केस की सुनवाई जल्दी नहीं हो पा रही है । वास्तव में सूचना आयोगों में भी पर्याप्त संख्या में न तो आयुक्‍त हैं न आवश्यक सुविधाएँ । ६. कई दागदार व्यक्‍तियों को भी सूचना आयुक्‍त/सूचना अधिकारी बना दिया गया है । यदि उन्हें मौका मिला तो इस कानून को तहस-नहस कर देंगे । ७. कई सूचना आयुक्‍त तो न्याय की सामान्य प्रक्रिया तक नहीं जानते । न्याय करने के लिए दोनों पक्षों की सुनवाई आवश्यक है परन्तु आयुक्‍त तो सिर्फ आवेदक को ही बुलाकर कुछ ही मिनटों में सुनवाई पूरी कर देते हैं । कभी-कभी तो आवेदक के खिलाफ भी फैसला कर डालते हैं ।
कैसे करें आरटीआई आवेदन :-१. सादा कागज पर ही आवेदन करें ।२. नकद, बैंक ड्राफ्ट, बैंकर्स चेक या पोस्टल ऑर्डर से शुल्क जमा करें । जो भी बैक ड्राफ्ट, बैकर्स चेक या पोस्टल बनवाएँ उन पर उस जनसूचना अधिकारी का नाम हो जिससे सूचना माँगी जाय । ३. आवेदन-पत्र संबंधित जन सूचना अधिकारी को स्वयं या डाक द्वारा भेजा जा सकता है । ४. आवेदनकर्ता को सूचना माँगने का कारण बताना जरूरी नहीं है । ५. यदि सूचना माँगने वाला व्यक्‍ति गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहा है तो उसे कोई शुल्क नहीं देना होगा, लेकिन उसे गरीबी रेखा के नीचे रहने का प्रमाणपत्र की छायाप्रति लगानी होगी । ६. कोई भी व्यक्‍ति ग्राम पंचायत से लेकर राष्ट्रपति महोदय तक किसी ही सरकारी कार्यालय से किसी भी अभिलेख, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, आदेश, लॉगबुक, कान्ट्रैक्ट, रिपोर्ट आँकड़े, माजल आदि की सूचना प्राप्त कर सकता है । ७. यदि ३० दिनो के भीतर सूचना नहीं मिलती है तो आपको अप्रील अधिकारी के पास (जो उसी विभाग का वरिष्ठ अधिकारी होगा) प्रथम अपील दाखिल कर सकते हैं । ८. यदि प्रथम अपील करने के ३० दिनों तक भी सूचना नहीं मिले तो संबंधित सूचना आयोग में ९० दिनों के भीतर दूसरी अपील कर सकते हैं ।
कैसे करें शिकायत/ अपील :-१. यदि आवेदनकर्ता को किसी भी आधार पर कोई सूचना देने से मना किया जाता है या ३० दिनों के भीतर सूचना नहीं मिलती है तो प्रथम अपील अधिकारी के पास शिकायर/अपील की जा सकती है ।२. यदि आवेदनकर्ता प्रथम अपील अधिकारी के निर्णय से भी असंतुष्ट हैं तो आवेदनकर्त्ता राज्य सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील कर सकता है । ३. यदि आवेदनकर्ता को सूचना अधिकारी का नाम नहीं बताया जाता है या फिर आवेदन लेने से ही मना किया जाता है तो आवेदक राज्य सूचना आयोग के पास शिकायत कर सकता है । ४. यदि आवेदनकर्त्ता को लगता है कि उससे माँगा गया शुल्क अविश्‍वसनीय या मिथ्या है तो भी सूचना आयोग से शिकायत की जा सकती है । ५. यदि आप साक्षर नहीं है या शारीरिक रूप में अक्षम हैं जो जनसूचना अधिकारी की बाध्यता है कि वह आपकी मदद करे । ६. यदि जन सूचना अधिकारी की लापरवाही की वजह से आपको कोई हानि हुई हो अथवा बार-बार सूचना आयोग के पास जाना पड़ा हो तो आप व्यय-भार की भरपाई की माँग करें । केंन्द्रीय सूचना आयोग ने इसी तरह के कुछ मामलों में आवेदकों को हरजाना दिलवाया है ।
नोट : ऐसी कोई भी जानकारी देश की संप्रभुता, अखंडता एवं सुरक्षा को प्रभावित करती हो, विधायिका या संसद के विशेषाधिकार का हनन करें या धारा-८ के अंतर्गत आती हो, ऐसी सूचना नहीं दी जा सकती है ।

१९६२ की लड़ाई के लिए पंड़ित नेहरू जिम्मेदार

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1 जुलाई 1954 को ही (भारत-चीन) सीमा पर बातचीत के दरवाजे बंद कर दिए थे। यह बात ए जी नूरानी की नई किताब में कही गई है। पुस्तक के मुताबिक नेहरू ने न केवल बातचीत के दरवाजे बंद कर दिए थे बल्कि 1960 में भारत दौरे पर आए और विवाद को समाप्त करने को तैयार चाउ एन लाइ को टका सा जवाब दे दिया था। इन दोनों कारकों ने 1962 के भारत-चीन युद्ध की नींव डाल दी।

लीगल मामलों के एक्सपर्ट ए.जी. नूरानी सरहद से जुड़े मसलों के अपने अध्ययन के लिए भी जाने जाते हैं। नूरानी ने इस पुस्तक में 17 पैरा मेमोरेंडम को उद्धृत किया है जिसमें नेहरू ने कहा है,'हमारी अब तक की नीति और चीन से हुआ समझौता दोनों के आधार पर यह सीमा सुनिश्चित मानी जानी चाहिए। ऐसी जो किसी के साथ भी बातचीत के लिए खुली नहीं है। बहस के कुछ बेहद छोटे मसले हो सकते हैं लेकिन वे भी हमारी ओर से नहीं उठाए जाने चाहिए।'


इंडिया-चाइना बाउंडरी प्रॉब्लम 1846-1947: हिस्ट्री एंड डिप्लोमैसी' नाम की इस पुस्तक में बताया गया है कि भारत ने अपनी तरफ से ऑफिशल मैप में बदलाव कर दिया। 1948 और 1950 के नक्शों में पश्चिमी (कश्मीर) और मध्य सेक्टर (उत्तर प्रदेश) के जो हिस्से अपरिभाषित सरहद के रूप में दिखाए गए थे, वे इस बार गायब थे। 1954 के नक्शे में इनकी जगह साफ लाइन दिखाई गई थी।' लेखक ने कहा है कि 1 जुलाई 1954 का यह निर्देश 24 मार्च 1953 के उस फैसले पर आधारित था जिसके मुताबिक सीमा के सवाल पर नई लाइन तय की जानी थी। किताब में कहा गया है,'यह फैसला दुर्भाग्यपूर्ण था। पुराने नक्शे जला दिए गए। एक पूर्व विदेश सचिव ने इस लेखक को बताया था कि कैसे एक जूनियर ऑफिसर होने के नाते खुद उन्हें भी उस मूर्खतापूर्ण कवायद का हिस्सा बनना पड़ा था।'

सौ. नभाटा।

Saturday, February 5, 2011

Hindi Movie - सूचना का अधिकार - Right to Information

SANDHAN: आत्महत्या का पाप

SANDHAN: आत्महत्या का पाप

आत्महत्या का पाप

तंत्र-मंत्र, टीका-चंदन, बाबा-बैरागी के बाद अब किसानी आत्महत्या के पाप-पुण्य की व्याख्या की है भाजपा सरकार के प्रवचनकारों ने. मध्यप्रदेश में लगातार बढ़ती किसानी आत्महत्या को टीकाधारी प्रदेश के कृषिमंत्री ने किसानों का पिछले जन्म का पाप बताया है. उन्होंने कहा कि लगातार किसानों ने खाद और केमिकलयुक्त दवाओं को डालकर धरती मां को बीमार करने का जो पाप किया है, उसी का परिणाम है कि धरती मां फसल खराब कर रही है और उनका पुत्र यानी कि किसान मरने को मजबूर है.

ऐसे उपदेशों की एक व्याख्या तो ये है कि किसान अपने कर्मों यानी पाप से मर रहा है. यानी उसकी आत्महत्या में किसी की जिम्मेदारी नहीं. न राज्य की, न केन्द्र की, न खाद-बीज बनाने वाली कंपनियों की, न नीति-निर्माताओं की और न बदलती प्रकृति की. दूसरी व्याख्या उन संघियों, एन.जी.ओ., सरकारी कारिंदों या तथाकथित् जैविक और प्राकृतिक खेती के पूजकों की है, जो कहते हैं कि हमने जल-जंगल-जमीन से जो छेड़छाड़ की, उसी का परिणाम है ये त्रासदी.

मतलब साफ है कि सब कुछ उस पापी किसान का ही किया धरा है. जबकि किसान और उसका खेत, बीज, खाद, सिंचाई, पैदावार उसके दाम और बाजार हमेशा सत्ता से नियंत्रित होते रहे हैं. फिर चाहे वो राजशाही हो, अंग्रेजी दौर की जमींदारी-सामंतशाही हो या फिर आज का तथाकथित लोकतंत्र. जिस हरित क्रांति या आधुनिक खेती को आज हमारे योजनाकार, राजनेता, सरकार, वैज्ञानिक या सामाजिक कार्यकर्त्ता लगातार गरिया रहे हैं, उसे किसान के खेतों तक पहुंचाने का पुण्यकर्म भी इन्होंने ही किया था. और आज किसान को पापी बताकर जैविक, प्राकृतिक या ऋषि की नारेबाजी भी यही खेत से दूर खड़े लोग कर रहे हैं.

असल में पाप-पुण्य की समझ ही खेती को धार्मिक कर्मकांड बना देने से निकली है. तभी तो प्रदेश के कृषि विभाग की वेबसाईट भरपूर अवैज्ञानिकता फैलाते हुए बताती है कि इस मुहूर्त या नक्षत्र में फलां वस्तु बोने से इतना फायदा होगा. इन्हें कौन बताये कि इल्ली का प्रकोप होने पर खेत में हवन करने पर इल्ली खत्म नहीं बल्कि भाग जाती है. प्रदेश का सिंचाई विभाग वॉटरशेड को शिवगंगा कह कर सिंचाई करने की बात करता है. प्रदेश का वन महकमा और उसके ज्ञानी वैज्ञानिक कहते हैं कि सीताफल और आंवले की पैदावार बढ़ाने के लिये पेड़ों को राग भैरवी सुनाना चाहिये और वो भी ऐरे-गैरे की नहीं प्रसिद्ध सितारवादक पं.रविशंकर के सितार से निकली हुई.

कृषिमंत्री को खुश करने के लिये प्रदेश के कृषि विश्वविधालय के वैज्ञानिक अब एक ‘‘अमृत पानी’’ तैयार कर रहे हैं, जिससे खेत की उत्पादन क्षमता बढ़ाई जाये. आश्चर्य है कि इसका पहला प्रयोग उसी सीहोर जिले के गांव में किया गया, जहां सबसे पहले किसान ने आत्महत्या की.

एक और अंधा प्रयोग प्रदेश का साईंस एंड टेक्नालॉजी विभाग करोड़ों रुपये खर्च करके प्रायः हर साल कई जगह कर रहा है. इसमें सोमयज्ञ किया जाता है और उससे सूखे खेतों में पानी गिराने का दावा किया जाता है. अभी तक पानी की एक बूंद भी नहीं गिरी पर करोड़ों रुपये का चूना जरुर लगा. जबकि खेती और किसान की पद्धति अपने-आप में एक विज्ञान है. जो हमें भडूरी की कहावतों से लेकर कृषि विज्ञान की पुस्तकों में अपने तथ्य और तर्क के साथ हमेशा दिखाई देती है. असल में ऐसी ही अवैज्ञानिकता से निकलता है पाप-पुण्य का फंडा, जो कि मरे हुए किसान के सिर पर फोड़ा जाता है.

आश्चर्य है कि इस पापी किसान के मरने की खबरें भी उन इलाकों या जिलों से ज्यादा आ रही हैं, जो या तो मुख्यमंत्री या कृषिमंत्री के गृह और राजनैतिक क्षेत्र हैं. जहां से ये लोग इसी पापी किसान के दम पर चुनाव जीतते आ रहे हैं. पिछले 15 दिनों में प्रदेश में 18 किसानों ने आत्महत्या की है. और इस सबका तात्कालिक कारण अत्यधिक ठंड के कारण पड़ा पाला या तुसार है. इस पाला ने कई सालों बाद एक अच्छी फसल को पूरी तरह खत्म कर दिया. इस फसल से उस किसान ने अपने सिर पर चढ़े कर्जे को पटाने की आशा पाली थी. इस फसल के लिये उसने लागत भी भरपूर लगायी थी लेकिन पूरी फसल चौपट हो गई.

कितना दुखद है कि जिस कर्जे को माफ करने की बात केन्द्र और राज्य की सरकारें पिछले कुछ सालों से लगातार करती आई हैं, वही कर्जा आज भी किसानों के गले का फंदा बना हुआ है. जबकि कई करोड़ रुपये इस किसान के कर्ज के नाम पर घोषित हो चुके हैं. वहीं पिछले दो सालों में केन्द्र और राज्य की सरकारें इसी झूठे आश्वासन और नारों के दम पर फिर से चुन कर आ गईं. अभी तक मध्यप्रदेश किसान आत्महत्या के मामले में तीसरे पायदान पर था पर पिछले पन्द्रह दिन की रफ्तार बताती है कि प्रदेश शीघ्र ही पहले नहीं तो दूसरे नंबर पर आने को तैयार है. वह भी तब जब इस प्रदेश का मुख्यमंत्री हर सांस में अपने-आप को किसान पुत्र बताने से नही चूकता है. जब इस प्रदेश का कृषि मंत्री अचानक स्वंयभू जैविक बाबा बन जाता है और जैविक नीति बनाने में लग जाता है. जब प्रदेश का कृषि विभाग अचानक नाम बदलकर खेती का नहीं किसान के कल्याण का विभाग बन बैठता है. जब विभाग के अदना से लेकर अदना तक के कर्मचारी कर्मकांडी तरीके से किसानों की बात करने लगते हैं. जब संघ से जुड़े संगठन का किसान संगठन नूरा-कुश्ती के रुप में अपनी 185 मांगों के लिये दो दिन तक राजधानी को जाम कर देता है. जब जैविक खेती और भोजन के अधिकार के नाम पर किसानों को बहलाने के लिये ढेरों एनजीओ धो-पोंछकर अपनी दूकानें चमकाने लगते हैं और बाजार, सरकार, वित्तीय संस्थानों तथा तकनीक को गरियाते हुए अखबारों में छाने लगते हैं.


ये मौतें तो सिर्फ बालिग या व्यस्क किसानों की हैं पर अगर हम किसान के सबसे छोटे प्रतिनिधि बच्चा या शिशु की कुपोषण से हुई मौतों का आंकड़ा देखें तो दिल दहल जाता है. कुपोषण की इन मौतों में भी प्रदेश पिछले कई सालों से सबसे ऊपर बैठा हुआ है. जबकि सरकार, राजनीतिक पार्टी और सिविल सोसाइटी इस मुद्दे पर भी अपने आपको सजग और सतर्क रहने का दावा करती है. पर कुपोषण से मौत का आंकड़ा हर क्षण बढ़ता जाता है.

फिलहाल 500 करोड़ रुपये राहत की घोषणा, पटवारी हल्का नहीं बल्कि अब प्रत्येक खेत का स्वतंत्र मुआवजा तय होने की बात. लगान माफी, ऋण वसूली पर तत्काल रोक, पचास प्रतिशत हानि को 100 प्रतिशत माना जाये. फसल बीमा के त्रुटिपूर्ण प्रावधान को संशोधित किया जाना, दलित-आदिवासी किसानों को 200 करोड़ रुपये के कर्ज माफ करने तथा अपंजीकृत साहूकारों के ऋण से छुटकारा दिलाने तथा गिरवी रखे खेत को नीलाम नहीं करने का कानून बनाने की बात किसान पुत्र मुख्यमंत्री ने फिर से बड़े जोर-शोर से उठायी है.

अब देखना है कि आत्महत्या करते उस दरिद्र और गरीब किसान या उसके परिवार तक इस घोषणाओं का कितना अंश पहुंच पाता है. क्योंकि इन भारी लाभों की घोषणा से जिनके चेहरे खिल उठे हैं, उनमें सरकारी कारिंदे, अफसर, सहकारी नेता, सत्ता पार्टी का राजनैतिक कार्यकर्त्ता और इन सबको साधने वाला गांव या क्षेत्र का बिचौलिया. जिनसे गुजरकर इस राशि का अंश उस पीड़ित तक पहुंचेगा. यानी मरे हुए के परिवार तक राशि पहुंचना भी हमारी व्यवस्था में इतना सरल नहीं.

ताजा उदाहरण केन्द्र सरकार की ऋण माफी योजना का है, जिसमें 60 हजार से अधिक अपात्रों का ही कर्ज माफ कर दिया गया. विधानसभा का हंगामा, विभिन्न जांच रपट, विरोधी दलों की अपील और मीडिया के खुलासे के बाद पता चला कि मध्यप्रदेश में 200 करोड़ रुपये ऐसे लोगों में बांट दिये गये जिनका खेती से या नुकसान से कोई लेना-देना नहीं है.

30 सितंबर 2010 को सामने आयी रपट बताती है कि 2 लाख 14 हजार 129 किसानों के, 245 करोड़ 72 लाख 14 हजार 353 रुपये के कर्ज माफी आवेदन पास हुए थे. जिसमें 60 हजार 188 दावे बोगस पाये गये. इनमें कई सारे तो कार, जीप, मोटरसाईकिल आदि के ऋण माफ कर दिये गये. और असल पात्र को ऐसी योजना का पता ही नहीं. आज प्रदेश के जिन गांवों में आत्महत्या हुई है उनमें से कई ऐसी किसी योजना के बारे में नहीं जानते.

किसानों के देश भारत में हम हमेशा से दो कहावतें सुनते आये हैं, एक तो हमारे यहां खेती एक जुआ है और दूसरा किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में जीता है और कर्ज में ही दम तोड़ देता है. यानी कर्ज लेना और या खेती पर दांव लगाना कोई अचानक या किसी साजिश से नहीं हुआ है. हां, ये जरुर है कि आज उसका रुप और मात्रा बदल गयी. किसान भी आज की पूंजीवादी दुनिया का ब्रम्ह वाक्य ‘‘हिम्मत करो, आगे बढ़ो’’ से प्रभावित होकर ज्यादा जोखिम उठाने लगा है. फिर कर्ज लेने में ज्यादा कोई बुराई भी नहीं, सिर्फ जरुरत है अपनी चादर को पहचान कर उसे मैनेज करने की.


ये जरुर है कि ‘‘क्रेडिट कार्ड’’ अन्य सरकारी योजनायें, अनुदान के हिस्से का लालच, बढ़ती लागत और बाजार का आकर्षण के नित नये लालच उसे भी बाकी समाज की तरह अपनी ओर रिझा रहे हैं. और फिर वैश्विक होती खेती, निर्यात योग्य फसल का दवाब, खेती का कंपनीकरण, कम या खत्म होता अनुदान, कम होता सरकारी निवेश, हवाला बाजार, बाहरी माल की डंपिंग, ठेका खेती, विश्व व्यापार संगठन की कठिन शर्तें और सत्ता का खेती को तीसरे पाले में (विकास दर में तीसरा हिस्सा) रखना भी किसान की रीढ़ तोड़ने के लिये काफी है.

योजना आयोग की 2009 की रपट कहती है कि किसानों का एक बड़ा हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत या तो खेती करना छोड़ चुका है या छोड़ना चाहता है. वहीं राष्ट्रीय रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े कहते हैं कि 1997 से 2010 तक यानी इन तीन सालों में दो लाख, सोलह हजार, पांच सौ किसानों ने न सिर्फ खेती को बल्कि दुनिया को ही अलविदा कह दिया, यानी कि आत्महत्या की. वहीं लाखों एकड़ उपजाऊ जमीन रायल इस्टेट, कंपनियों, बायोफ्यूल, सेज, सड़क और बांधों की बलि चढ़ गयी. इनमें भी 60-65 प्रतिशत हिस्सा उस छोटे सीमांत किसान या खेतीहर मजदूर का है, जो हमारी बढ़ती हुई व्यवस्था या ऊंची उठती विकास दर के बही-खाते से नदारद है. न सिर्फ सत्ता के बही-खाते से बल्कि विभिन्न राजनीतिक धाराओं, सिविल सोसाईटियों, मीडिया या योजनाकारों के बोलचाल, लिखा-पढ़ी में भी इसका जिक्र नहीं है. इसका थोड़ा बहुत जिक्र सिर्फ भोजन सुरक्षा बिल या भोजन के अधिकार जैसे उसके सामने फेंके टुकड़ों में है, जिससे ये आधा पेट रहकर न मर सकें, न संगठित होकर विद्रोह पर उतर सकें और मध्यम, उच्च मध्यम वर्ग की दूकानें इसकी आंच व आग से बची रहें.

शायद यही कारण है कि जिसके पास खोने को कुछ भी नहीं, उससे डर कर आज एक बड़ी लॉबी या जमात भोजन का अधिकार, रोजगार का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, जंगल का अधिकार और तथाकथित सूचना के अधिकार जैसे झुनझुने उसके बहलाने के लिये पकड़ा रहे हैं. यानी खदबदाती हुई आग पर पानी डालने का काम कर रही है.

जनगीतकार बल्लीसिंह चीमा के गीत “ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के” की पंक्तियां ‘‘तेलंगाना जी उठेगा, देश के हर गांव में’’ गाते हुए हम बड़े हुए हैं और हमने जाना है कि तेलंगाना के किसानों का सामंती व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष मारने वाला या मरने वाला नहीं. शायद इसलिये कवि ने क्रांति के इस बीज को गांव-गांव तक पहुंचाने की कल्पना और जरुरत समझी थी.

तेलंगाना ही नहीं तिभागा, पुलप्पावायलर, श्रीकाकूलम, नक्सलबाड़ी, निपानी, बोधगया, चंपारण का इतिहास हमें किसानों के संगठन, संघर्ष और जुझारुपन की ही बार-बार याद दिलाता है. आखिर क्या कारण है कि हमारा आज का किसान एक बहुत ही व्यक्तिवादी, निराशात्मक दौर से गुजरकर आत्महत्या की ओर प्रेरित हो रहा है. ये सोचने-समझने और विचार करने का प्रश्न है.


(योगेश दीवान)

सूचना को ना

तो क्या अब सूचना का अधिकार भी देश के दूसरे सैकड़ों नियम-कायदे और कानून की तरह नौकरशाहों की साजिशों का शिकार बन कर रह जायेगा ? कम से कम झारखंड में जिस तरीके से सरकारी भर्राशाही में इस कानून का दम निकालने की कोशिश हो रही है, उससे तो ऐसा ही लगता है. लाट साहबों के नखरे रखने वाले सरकारी अधिकारी-कर्मचारी और सूचना अधिकारी व सूचना आयुक्त मिल-जुल कर इस कानून के खिलाफ ऐसे-ऐसे दाव-पेंच अपना रहे हैं, जिसमें इस कानून के सहारे सूचना निकलवाने का सपना देखने वाले आम आदमी का दम निकल जाये.


झारखंड में सरकारी भर्राशाही का आलम ये है कि राज्य सरकार के अधिकांश विभाग अव्वल तो सूचना के अधिकार के तहत आवेदन लेने में ही आनाकानी करते हैं. अगर किसी तरह आवेदन ले भी लिया तो सूचना देना-न देना उनकी ‘कृपा’ पर निर्भर होता है. सूचना न मिले तो आप अपील कर सकते हैं, राज्य आयुक्त के पास जा सकते हैं. लेकिन इन सबों के बाद भी सूचना मिल जाये, ये जरुरी नहीं है. हां, सूचना आयुक्त से अपील के बाद आवेदन वापस लेने की धमकियां आपको ज़रुर मिल सकती हैं.

सरकार ने प्रसाद बांटने की तरह राज्य में सूचना आयुक्त बनाये और सबको पीली बत्तियां बांट दी. मोटी तनख्वाह पाने वाले इन सूचना आयुक्तों के जिम्मे कितने काम हैं, यह देखने-जानने की फुरसत किसी के पास नहीं है. जबकि यहां अन्य राज्यों की तरह एक-दो सूचना आयुक्तों से भी काम हो सकता था.

इस पद की शोभा बढ़ाने वालों की मंशा जनता की सेवा में कम मलाई मारने में ज्यादा है. सरकार में बैठे नेताओं की परिक्रमा कर कई लोग लिखा-पढ़ी का काम छोडकर यह पद पाने में सफल हो गये. सरकार में बैठे लोगों के लिए अपने लोगों को उपकृत करने के लिए अच्छा मौका मिल गया. धीरे -धीरे यह पद मलाईदार बनता गया. इन आयुक्तों की ठसक किसी मंत्री से कम नहीं रह गयी. फिलहाल सूचना आयुक्तों की कार्यशैली पर ही कई तरह के प्रश्न खड़े होने लगे हैं. कुछ सूचना आयुक्त लगभग थानेदार की भूमिका निभा रहे हैं और उल्टा सूचना के बदले लोगों को ब्लैकमेल कर रहे हैं.

दूरदराज से लोग शिकायत लेकर सूचना आयुक्तों के पास आते हैं. लेकिन इन्हें न्याय मिलना तो दूर कार्यालयों के इतने चक्कर लगवाये जाते हैं कि ये थक हार कर वापस लौटने को विवश हो जाते हैं.

पिछले दिनों रांची के केन्द्रीय पुस्तकालय में यूथ फॉर द चेंज के तत्वावधान में आयोजित जन सुनवाई कार्यक्रम के दौरान राज्य में सूचना के अधिकार के हाल को लेकर हैरतअंगेज तथ्यों का खुलासा हुआ.

दुमका के प्रो. बह्मदयाल मंडल ने सूचना आयुक्त पर आरोप लगाया कि सूचना मिलना तो दूर, उनके मामले में एफआईआर दर्ज कराने की धमकी दे डाली. सूचना के अधिकार के तहत दुमका के जिला शिक्षा पदाधिकारी सह लोक सूचना अधिकारी शिवचरण मंडल से शिक्षा विभाग से संबधित सूचनाएं मांगी थी. सूचना तो नहीं मिली, बदले में प्रताड़ना मिली. उनकी बहू रंभा कुमारी को सूरजमंडल उच्च विद्यालय सरैयाहाट दुमका से निकाल दिया गया तथा अभद्र व्यवहार किया गया.

रांची धुर्वा के नागेश्वर शर्मा ने कहा कि उन्होंने राज्य पुलिस की बहाली की मेगा सूची सूचना के अधिकार के तहत मांगी थी लेकिन तीन साल के बाद भी उन्हें सूचना नहीं दी गयी और मामला हाईकोर्ट में चल रहा है.

झारखंड के साहबगंज के राधेश्याम कहना था कि उनके घर के बगल में विडियो सिनेमा हॉल खोल दिया गया. उन्होंने सूचना मांगी कि आवासीय परिसर में ऐसे सिनेमा हॉल खोलने की अनुमति किस प्रक्रिया के तहत दी गयी. उन्हें सूचना नहीं दी गयी.

राज्य के पूर्व मंत्री रामचंद्र केसरी का कहना था कि गढ़वा के उपायुक्त ने एक निर्देश जारी किया है कि अब प्रखंड तथा अनुमंडलों की जगह केवल जिला में ही लोक सूचना पदाधिकारी होंगे. यह मनमानी नहीं तो और क्या है?

झारखंड में श्री कृष्ण लोक प्रशासन केन्द्र ने आम लोगों को सूचना उपलब्ध कराने की गरज से पिछले वर्ष अधिकारियों का प्रशिक्षण चलाया था ताकि वे इस कानून को बेहतर ढंग से समझ सकें. वहीं इस संस्थान ने अपने दरवाजे आम लोगों के लिए खोल दिया तथा आम लोगों को प्रशिक्षण दिया. केन्द्र के तात्कालीन महानिदेशक अशोक कुमार सिंह ने इस दिशा में सकारात्मक पहल की थी . लेकिन इन प्रशिक्षणों के उलट लोगों को सरकारी महकमे में अब सवाल पूछने की सजा मिल रही है.


हालांकि कई सूचना अघिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अब वे अभद्र व्यवहार करनेवाले सूचना आयुक्तों के यहां से अपने मामले का तबादला कराएंगे. साथ ही शपथपत्र दाखिल कर राज्यपाल को वस्तु स्थिति से वाकिफ कराएंगे. इसके अलावा प्रीवेंशन आफ करप्शन एक्ट 31-डी के तहत मुकदमा दायर करेंगे.

मैग्सेसे अवार्ड विजेता अरविंद केजरीवाल कहते हैं “सूचना आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत है. सूचना आयुक्तों की एक लंबी टीम की नहीं बल्कि एक सूचना आयुक्त ही काफी है.”

आंकड़े बताते हैं कि इस कानून को लागू हुए पांच वर्ष बीत गए लेकिन स्थिति है कि केवल 15 फीसदी मामले में ही लोक सूचना अधिकारी तय समय सीमा में जवाब दे पाते हैं. 55 फीसदी लोगों को सूचना मिलने में तीस दिनों से ज्यादा समय लगा तो 9 फीसदी लोगों को 60 दिनों से ज्यादा इंतजार करना पड़ा. एक फीसदी लोगों को एक वर्ष से ज्यादा समय तक का इंतजार करना पड़ा. 19 फीसदी लोगों को सूचना ही नहीं मिली. पारदर्शिता और सुशासन के नाम पर राज कर रही सरकारों के कथनी करनी की पोल स्वतः खुल जाती है.

एक अध्ययन के मुताबिक सूचना आयोगों का दरवाजा खटखटाने वाले 100 में से 27 लोगों को ही सही जानकारी मिल पाती है. अपीलकर्ता के पक्ष में 39 फीसदी ही आदेश लागू हो पाते है. प्रदेश स्तर पर तैनात सूचना आयुक्तों की दोषपूर्ण कार्यप्रणाली के कारण सूचना के अधिकार का लाभ आम लोगों को नहीं मिल पा रहा है.

सूचना के अधिकार में वे ही लोग बाधा बन रहे हैं जिन लोगो पर इसके कार्यान्वयन की जिम्मेदारी है. सूचना आयुक्तों के पास अधिकार के तौर पर ऐसे दांत हैं, जिसका इस्तेमाल वे दोषियो को दंडित कर सकते है.

अरविंद केजरीवाल कहते हैं- “धारा 18 के तहत सूचना आयुक्त अधिकारियों से न केवल जानकारी ले सकते है बल्कि पुलिस का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राजनीतिक हस्तक्षेप से बल्कि योग्यता के आधार पर की जानी चाहिए. आम जनता तो इस कानून की मदद से भ्रष्टाचार पर कारगर तरीके से नकेल कसने का प्रयास कर रही है तो दूसरी तरफ सरकार में बैठे भ्रष्ट अधिकारी और नेता लोगों को सूचना और उनके अधिकार से वंचित ही करना चाहते हैं.”

सूचना के अधिकार से वंचित करने वाले अधिकारी और सूचना आयुक्तों के मामले को सुनते हुये ‘बाड़ द्वारा ही खेत को खाने’ का पुराना किस्सा याद आता है न !


(कुमार कृष्णन)

खाली पेट गणतंत्र

देश का पहला बजट 200 करोड़ रूपये का था. 60 वर्षों में इसका आकार 200 करोड़ से 10 लाख करोड़ रूपये पर पहुँच गया. पर अफसोस यदि कुछ नहीं बदला तो गरीबी और भुखमरी का दर्द. इस गणतंत्र के पर्व पर भी हम गर्व से नहीं कह सकते हैं कि आर्थिक विकास ने लोगों को भूखी रातों से मुक्ति दिला दी है. यहां आज भी हर रोज 42 करोड़ लोग पेट भरे बिना नींद के आगोश में जाते हैं.


सवाल यह है कि बजट जब 5000 गुना बढ़ता है, तब अनाज उत्पादन चार गुना ही बढ़ पाता है. ग्रामीण भारत में 23 करोड़ लोग अल्पपोषित हैं, 50 फीसदी बच्चों की मृत्यु का कारण कुपोषण है. 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग में हर 3 में से एक व्यक्ति कमजोर है. सरकार लगभग 22.8 करोड़ टन अनाज उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने की जद्दोजहद में है परन्तु वर्ष 2015 में इसे अपनी जरूरत पूरा करने के लिए 25 से 26 करोड़ टन अनाज की जरूरत होगी, यह पूरा हो पाना संदेहास्पद है. दुनिया की 27 प्रतिशत कुपोषित जनसंख्या केवल भारत में रहती है.

5 वर्ष से कम उम्र के 70 फीसदी बच्चों में खून की कमी है. 19 में से 11 राज्यों में 75 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे एनीमिया के शिकार हैं. मतलब यह है कि भारत का विकास आंकड़ों का मकड़जाल है. यह लोगों की जिन्दगी में बदलाव का सूचक नहीं है.

1972-73 में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 15.3 किलोग्राम अनाज को उपभोग होता था, अब वह 12.22 किलोग्राम प्रतिमाह आ गया है. 2005-06 में एक सदस्य औसतन उपभोग 11.920 किलोग्राम था और वहीं 2006-07 में औसत भोजन का उपभोग घटकर मात्र 11.685 (1.97प्रतिशत कम) किलोग्राम प्रति व्यक्ति रह गया.

एक तरफ तो लोग भूखे सोने पर मजबूर हैं और दूसरी तरफ लाखों मीट्रिक टन अनाज खुले में पड़ा है. भारत में 415 लाख टन अनाज सुरक्षित रखे जाने की क्षमता है. 190 लाख टन अनाज केवल पन्नियों के नीचे असुरक्षित परिस्थितियों में पड़ा है. इस अनाज के त्वरित वितरण से एक बड़े हिस्से को राहत पहुंचाई जा सकती है. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के 35 किलो अनाज वितरित करने के निर्देश का भी पालन नहीं किया जा रहा है और 20 से 25 किलो अनाज ही बांटा जा रहा है। खुले में रखे इस अनाज का उपयोग इस गैप को खत्म करने में किया जा सकता है. 600 लाख टन अनाज के भंडारण के बावजूद इस राजनैतिक-प्रशासनिक इच्छाशक्ति का अभाव है कि इसे गरीब और सबसे वंचित वर्ग तक पहुंचाया जा सके.

आजादी के बाद से ही यह मान लिया गया कि विकास तो औद्योगिकरण से ही होगा. आर्थिक नीतियां ही ऐसी बनाई गईं, जिनमें खेती को ‘‘अकुशल श्रम’’ माना गया और खेती के श्रम के मूल्य को कम आंका गया. सरकारों द्वारा शहरी क्षेत्र, उद्योगों और नौकरशाहों को तरह-तरह की सब्सिडी भी दी गई, जिससे वे तो तेजी से सम्पन्न हुए और किसान, ग्रामीण मजदूर और गाँव गरीब होते गए.

खाद्यान्न उत्पादन में उपयोग की जा रही जमीन और पानी को छीनकर उद्योगों को देने में खाद्यान्न सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी ? लाखों आदिवासियों को पालने वाले जंगलों को खदानों और फैक्ट्रियों के लिए नष्ट किया जा रहा है. इस पर रोक लगनी चाहिये.

खाद्य असुरक्षा का प्रमुख कारण है कृषि क्षेत्र के लगातार शोषण से उत्पन्न उसमें मौजूदा संकट. हालात यह हैं कि आज देश की 66 प्रतिशत आबादी सीधे कृषि पर निर्भर है, पर इस आबादी का देश की कुल कमाई में हिस्सा केवल 17 प्रतिशत है. दूसरी तरफ निजी कंपनियों का एक प्रतिशत से भी कम होने के बावजूद वह देश की 33 प्रतिशत कमाई पर अपना दावा करता है. असली ‘‘खाद्य सुरक्षा’’ तभी मिल सकती है जब न केवल शोषण और विस्थापन की नीतियाँ बदलें, बल्कि भारत की राजनैतिक अर्थव्यवस्था ही बदली जाए. जब तक देश से कुपोषण समाप्त न हो जाए तब तक खाद्यान्न के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जाये.

अमीर देशों में पशु और पोल्ट्री में गरीब देशों से आयातित अनाज खिलाया जा रहा है जबकि हमारे देश के गरीब भूखे रह रहे हैं. खरीद सभी मंडियों से हो ताकि सरकारी खरीद का फायदा सभी इलाकों को मिले न कि सिर्फ पंजाब, हरियाणा, आंध प्रदेश और उत्तरप्रदेश के कुछ इलाकों से, जैसा कि फिलहाल होता है.

कई ऐसे इलाके हैं जहां खाद्यान्न की किल्लत है. इसलिए यह जरूरी है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से कमी वाले इलाकों में खाद्यान्न पहुंचाना केन्द सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए, जो जन वितरण प्रणाली का बुनियादी मकसद रहा है. हर ब्लॉक में अन्न भण्डारण के लिए भंडार होने चाहिए, वर्तमान में उचित भण्डारण की कमी के कारण हजारों टन अनाज सड़ रहा है. सरकार न तो इस अनाज के सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था कर रही है और न ही इसे भूखे लोगों में वितरित कर रही है. स्थानीय खरीदी, भण्डारण और वितरण के जरिये खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये गांव स्तर पर अनाज बैंक स्थापित किये जायें.


विस्तारित पीडीएस के साथ नई खरीद नीति बनना जरुरी है. न्यूनतम समर्थन मूल्य पर मोटे पौष्टिक अनाज, दालें और तिलहन की खरीद इन फसलों को सहारा देंगी जो फिलहाल कम और अनिश्चित दाम और कम निवेश के चलते उपेक्षित है. मोटे अनाज और दालों का समर्थन मूल्य अभी बहुत कम है. दालों की कीमतों में हालिया चढ़ाव के दौरान भी किसान ने दालें 25-35 रूपये प्रति किलोग्राम के भाव पर बेची. मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 27.6 रूपये प्रतिकिलो, तुअर का 23 रूपये किलो था जबकि खुदरा भाव 65 से 120 रूपये प्रति किलो तक रहे.

60 गणतंत्र दिवसों का उत्सव मना चुके इस देश में भुखमरी और खाद्य सुरक्षा के सवाल भौतिक (यानी उत्पादन) के सवाल न होकर पराभौतिक (यानी राजनैतिक और आर्थिक नीतियां) हैं. आज की स्थिति को चिंतनीय माना जाना चाहिये जबकि 77 प्रतिशत लोग जीवन जीने के लिये प्रतिदिन महज 20 रूपये खर्च कर पाने की स्थिति में है और प्याज 60 रूपये, टमाटर40 रूपये, दालें 70 से 90 रूपये किलो के भाव से बिक रही हैं.

मुद्रा की कीमत जीवन की बुनियादी जरूरतों के सापेक्ष लगातार कम हो रही हो, तब यदि सरकार (जिनमें प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, कृषि मंत्री और योजना आयोग शामिल है) सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करती हो कि मंहगाई के संकट को खत्म करना उसके बूते की बात नहीं है, तब तो हमें कम से कम यह सवाल पूछना ही चाहिये कि आखिर इस गणतंत्र को चला कौन रहा है? बार-बार यह साबित हुआ है कि कृषि मंत्रालय ने पिछले 5 सालों में बाजार की बड़ी ताकतों को लाभ पहुंचाने के लिये आपूर्ति को कम किया है, दाम चरम स्तर तक बढ़ने दिये हैं, काला बाजारी को नजर अंदाज किया है और इससे भी आगे बढ़कर सार्वजनिक रूप से यह कह कर उन्हें प्रोत्साहन दिया है कि बढ़ती कीमतों के दौर में भी सरकार चादर तान कर और मुंह ढंककर गहरी नींद में होने का नाटक करती रहेगी.

इन परिस्थितियों में सरकार जिन तर्कों को आधार बनाकर लोकव्यापी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को नकार रही है, उनमें सबसे प्रमुख है कि सबको देने लायक अनाज देश में है ही नहीं ! पर यह तर्क एक झूठ है. यदि सरकार हर परिवार (23 करोड़ परिवार) को 50 किलो अनाज देना चाहे तो उसे केवल 138 लाख तक अनाज की जरूरत होगी जबकि देश के किसानों ने वर्ष 2008-09 में 219 लाख टन अनाज उगाया था. हम मानते हैं कि सभी 23 करोड़ परिवार सस्ता अनाज नहीं लेंगे और यदि 80 फीसदी परिवार ऐसा अनाज लेते हैं तो सरकार की जरूरत केवल 110 लाख टन की रहेगी. यानी देश में अनाज है. इसी तरह यदि इतने ही परिवारों को 5.25 किलो दालें दीं जाये तो केवल 1.15 करोड़ मीट्रिक टन दालों की जरूरत होगी जबकि उत्पादन 1.47 करोड़ मीट्रिक टन से ज्यादा है. जब एक परिवार को हर माह 2.8 किलो तेल देना होगा तो 61.8 लाख टन खाद्य तेल की जरूरत होगी और सभी स्रोतों को मिलाकर देख में वर्ष 2008-09 में 183 लाख टन खाद्य तेल की उपलब्धता थी.

मामला साफ है कि देश में खाद्यान्न पर्याप्त है. दूसरा बड़ा तर्क है कि लोकव्यापी खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने के लिये सरकार को 90 हजार करोड़ रूपये खर्च करने पड़ेंगे और इतना धन सरकार के पास नहीं है. सच्चाई यह है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में से 18 प्रतिशत ही टैक्स के रूप में सरकार के पास आता है जबकि अमरीका में 28 प्रतिशत और स्केन्डेनेवियन देशों में यह अनुपात 45 से 50 प्रतिशत है.

गरीबी की रेखा बहिष्कार की प्रक्रिया को बुनती है जिसमें दलित, आदिवासी, एकल महिलाएं, वृद्ध बच्चे, विकलांग और दूसरे वंचित वर्ग खाद्यान्न योजनाओं से वंचित हो जाते हैं. इन्हीं परिस्थितियों में जब जरूरत के मान से हकों का निर्धारण नहीं होता है तब भ्रष्टाचार पनपता है और गैर-जवाबदेहिता की स्थिति में लोगों तक उनके अधिकार नहीं पहुंच पाते हैं. गरीबी की रेखा के छोटे होते जाने के कारण ज्यादातर लोग खुले बाजार के शोषण के शिकार होते हैं. भुखमरी से मुक्ति, जीवन के अधिकार, शोषण को चुनौती देते हुए समानता आधारित जवाबदेय व्यवस्थापक की स्थापना खेती-प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का सर्वव्यापी होना ही एकमात्र विकल्प है.

एक ओर तो सरकार सेवा और उद्योगों से टैक्स ही कम लेती है और दूसरी ओर इस टैक्स पर भी भारी छूट दी जाती है. वर्ष 2009-10 में केन्द्र सरकार ने टैक्स में 5,02,229 करोड़ रूपये छूट दी जो कुल टैक्स संग्रह का 79.54 प्रतिशत है. इसी साल सोना, हीरा और आभूषणों में कस्टम ड्यूटी पर 39796 करोड़ रूपये की छूट दी गई. हमें मध्यमवर्गीय समाज को यह बताना होगा कि उनकी विलासिता और सुविधा के लिये सरकार तीन चौथाई जनसंख्या को भूखा रख रही है; क्या उन्हें यह स्थिति मंजूर है! किसान और आदिवासी इस गणतंत्र के मूल निवासी हैं, उनकी उपेक्षा करके बनाई गई कोई भी नीति समतामूलक और न्याय आधारित समाज की दिशा में ही बढ़ेगी; यह हमारे नीति निर्माताओं को स्वीकार कर लेना होगा.


(सचिन कुमार जैन)

All BJP chief ministers should declare assets: Advani

New Delhi: Pledging to set an example in the fight against black money, BJP-led NDA today said it would direct its chief ministers and senior most leaders to declare their assets and asked the government to make all efforts to bring Indian slush funds stashed in tax havens.

Senior NDA leaders held a press conference to present the report of a task force appointed by BJP to look into the issue of Indian black money stashed abroad and ways of dealing with the issue.

"We liked (the report) and the NDA also said it is appropriate that all those holding political office, whether we are members of Parliament, whether we are leaders of political parties recognised by the Election Commission....

".... or even Central office-bearers of the political parties, or MPs. We would like all of them to be obligated to tell the government that we have no money abroad," NDA Working chairperson L K Advani said.

The NDA leaders endorsed the suggestions of the report which targets corrupt politicians as well.

"There should be a general, not specifically against any persons, FIR against (those keeping black money abroad). It has been done in the case of terrorism in Punjab, in the North East... in Nagaland," Advani said.

The senior leader quoted a recent survey which claimed that the general perception among people about politicians is that around 60 per cent of them are corrupt.

Taking a cue from Advani, Punjab Chief Minister Prakash Singh Badal said, "A big issue has come up in the country...NDA chief ministers should first give in writing and announce their assets and tell the government that it can seize any black money they have."

Asked if he agreed with Badal and whether Karnataka Chief Minister B S Yeddyurappa should also declare his assets, Advani replied in the affirmative, saying all BJP and NDA chief ministers should do so.

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Saturday, July 17, 2010

More poor' in India than Africa

http://news.bbc.co.uk/2/hi/south_asia/10609407.stm

The new measure of poverty assesses household poverty Eight Indian states account for more poor people than in the 26 poorest African countries combined, a new measure of global poverty has found.

The Indian states, including Bihar, Uttar Pradesh and West Bengal, have 421 million "poor" people, the study found.

This is more than the 410 million poor in the poorest African countries, it said.

The Multidimensional Poverty Index (MPI) measures a range of "deprivations" at household levels.

Developed by Oxford Poverty and Human Development Initiative (OPHI) with UN support, it will feature in the upcoming UNDP Human Development Report.

The measure assess a number of "deprivations" in households - from education to health to assets and services.

"The MPI is like a high resolution lens which reveals a vivid spectrum of challenges facing the poorest households," said OPHI director Dr Sabina Alkire.

UNDP finds 8 Indian states acutely poor

http://www.indianexpress.com/news/undp-finds-8-indian-states-acutely-poor/645647/
Agencies Tags : Poverty, UNDP Posted: Tue Jul 13 2010, 03:36 hrs London:

Acute poverty prevails in eight Indian states, a new ‘multidimensional’ measure of global poverty has said. The measure claims that the eight states put together account for more poor people than those present in the 26 poorest African nations combined.

The new measure, called the Multidimensional Poverty Index (MPI), was developed and applied by the Oxford Poverty and Human Development Initiative (OPHI) with the United Nation Development Programme’s (UNDP) support. It will be featured in the forthcoming 20th anniversary edition of the UNDP Human Development Report.

The measure reveals there are more ‘MPI poor’ people (421 million) in eight Indian states — Bihar, Chhattisgarh, Jharkhand, Madhya Pradesh, Orissa, Rajasthan, UP and West Bengal — than in the 26 poorest African countries combined (410 million).

MPI gives a multidimensional picture of people living in poverty and is expected to help target development resources more effectively, its creators said. The MPI supplants the Human Poverty Index, which had been included in the annual Human Development Reports since 1997.

The 2010 UNDP Human Development Report will be published in late October, but research findings from the MPI were made available Monday at a policy forum in London and on the websites of OPHI and the UNDP Human Development Report.

MPI assesses a range of factors or ‘deprivations’: from education to health outcomes to assets and services. Taken together, these factors provide a fuller portrait of acute poverty than simple income measures. The measure reveals the nature and extent of poverty in the household, region, nation and at an international level. This new approach has been adapted for use in Mexico, and is now being considered by Chile and Colombia.

Thursday, July 8, 2010

Public Petition of the Nuclear Liability Bill

Hi,

This is exciting! Along with 187,759 people I signed a petition asking the Prime Minister to hold a public consultation before taking a decision on the nuclear liability bill. These petitions were delivered to the Standing Committee looking at the bill and now they have decided to hold a public consultation.

The bill in its current form lets the foreign corporations get away by paying a meagre amount in case of a nuclear accident in India. The major chunk of the expenses will be borne by the Indian tax payers. But now we have a chance to change this bill and make it stronger.

Greenpeace, an NGO working on this issue, has prepared an open letter which states the changes required in the bill. Just like the petition, this letter will stand a chance of being considered if lots of us sign it. We have less than two weeks to change the bill and prevent another Bhopal in the making.

I have already added my signature.

Can you add your signature to this letter?

http://www.greenpeace.org/india/change-the-liability-bill

Thanks!

Rakesh Ranjan

Friday, April 16, 2010

Chief Election Commissioner asks for power to deregister political parties

Chief Election Commissioner asks for power to deregister political parties
Parties should furnish annual report and accounts, says Vinay Sahasrabudhe, Member National Executive Council of BJP,

Increase of mafia power worrying, says K K Mishra, Congress spokesman CEC releases “Lok Sabha 2009 Election Watch: A compendium of state election watch reports”

Bhopal, April 10 and 11, 2010‐ On the first day of the sixth national conference on Electoral and Political Reforms being organized by Association for Democratic Reforms and National Election Watch, Mr Navin Chawla, Chief Election Commissioner, released a book “Lok Sabha 2009 Election Watch: A compendium of state election watch reports”. The book contains analysis on criminal and financial details of candidates and winners of Lok Sabha 2009 Elections for all states and UT‘s of India. The delegates to this conference include civil society organizations, eminent citizens, media, senior bureaucrats and Police officials, leaders from the corporate sector and the political parties.

Speaking at the conference Mr Chawla said, “The EC should be given power to De-register political parties especially those which do not even contest elections.” He also expressed deep concern about increasing instances of paid news which needed to be addressed urgently.

Speaking on the importance of the political party reforms, Mr। Manickam Tagore, MP INC said, “All political parties remain closed for new entrants, unless they have some connections. This closed nature of the parties needs to be changed and the gates should be opened to meritorious youth”.

On the importance of electoral reforms Mr. Kirit Somaiya, National Secretary BJP said, “Electoral and political reforms are crucial for the progress of the country. Paid news is a menace on which action should be quickly taken so that the spirit of democracy is kept alive”.

Mr Anil Madhav Dave, MP, BJP strongly appealed that, “Vidhan sabha and Lok sabha elections should be held jointly so that constant elections don’t become hindrance to development”.

On the second day, Representatives of Congress and BJP discussed issues like inner party democracy and funding transparency, on the concluding day of the sixth national conference on Electoral and Political Reforms organized by Association for Democratic Reforms and National Election Watch. Vinay Sahasrbuddhe, Member of BJP Executive Council said that political parties should also subject some regulation and be asked to furnish annual reports of activities and accounts. He also added that politicians should undergo professional training to become effective legislators. Mr. K.K.Mishra, Congress spokesperson from Madhya Pradesh, expressed concern about the increased role of money power and criminals in elections.

The conference also discussed the role of media in elections, and the increased danger of the phenomenon of “paid news” in election campaigns. Mr. L. C. Jain, former member of Planning Commission said that edifice of India’s democracy cannot be built without strong foundations of integrity in politics.

The conference concluded with resolutions demanding no criminal candidates, an option for “none of the above” on the voting machine and political party reforms.

Thursday, February 11, 2010

People not told about their right

These documents are a sample of how the money received from the Central Government for telling the public and government officers about right to information Act has been misused by RCVP Noronha Academy of Administration & Management. The responsible officers traveled around the country and ate fancy on the money meant to be used for educating people about their right to information. To cover this up, the documents have also tampered with.

RCVP Noronha Academy of Administration & Management (the academy), was chosen by the Central Government as the nodal agency for raising awareness on Right to Information Act, 2005, among the public and government employees. In 2009, 13 lakh rupees was sanctioned to it by the Central Government for this purpose. However, it seems that training has only occurred on papers; the people so trained were not even asked for their feedback on the training.

The training camps organised by the academy were restricted only to colleges. The primary reason for this is that the officer designated as nodal officer responsible for training, is closely associated with the department of higher education. That’s the reason why this scheme could not get implemented beyond colleges. In the year 2009, the academy held around 12 RTI workshops in government colleges. Due to the connivance of both the nodal officer and the college authorities, the academy stayed silent on the issue of RTI workshops being shown just in papers. They never cared to check as to what was being shown in the utility assessment letters of the college and whether the workshops were actually taking place or not. The nodal officer and the academy without even asking kept disbursing money to the colleges.

Dhar: study material for dissemination distributed amongst illiterates

In the government P.G. college of Dhar, study material for dissemination/training was distributed to a group of illiterates. At the same time, the names and addresses of BPL cardholders who were shown as present for the workshop in papers, have not been made any note of. It has been shown in papers that the workshop was attended by 160 participants whereas the list only has names of 112 participants. The college was given Rs 35,000 for a one-day workshop, which on paper, has been spent.

Mandala and Khargon: pilot project also crushed

From 2006 to 2008, Mandala and Khargon districts were made a part of the pilot project by the academy. Hence, they were allotted a sum of twelve lakh each, but no efforts were made for training in any of these districts. As a consequence, the Madhya Pradesh state information commission had to deal strongly with both the districts. Upon refusal to give information regards work done in Mandala under the pilot project, the MP information commission sent penalty notices to three officers. Show cause notices were also sent to the collector and Jabalpur commissioner.


Bhopal: made students compensate for the money spent

A training workshop was organised in the capital at Sarojini Naidu (Nootan) Government Girls Post Graduate College, Bhopal. Here too, more expenses were incurred on account of food and drinks as opposed to actual training. According to documents present with Dainik Bhaskar, Rs 14,500 was spent here on just food and drinks and only Rs 16,500 used for distributing study material. Nootan college also received Rs 35,000, along with which the college management made the professors pay Rs 300 each and the students pay Rs 10 each. The sociology department of the college was also made to give Rs 20,000 even though there is no provision for demanding any money from the college or the UGC fund nor from the professors or the students. This money was collected in the form of donations and spent off!

Muraina: number of participants not known

On November 1st, 2009, a workshop was held under the leadership of Dr. Sandeep Khanna, Director of Government P.G. college, Muraina. It was attended by ten IAS officers who had come to the college for training. However, their names and addresses are not known. Muraina college spent Rs 4,275 in excess of Rs 35,000 that it received for this purpose thus taking its total expenditure to Rs 39,295. There is also discrepancy in the utility assessment letter sent by it to the academy. The letter says that the workshop was attended by 275 participants, of which 75 were from the college, 75 general public (from outside the college) and 75 belonged to the BPL card holders. In a separate document, it is stated that the workshop was attended by 10 IAS officers of the academy, 100 BPL card holders, 10 distinguished citizens, 15 students, 40 professors and journalists (in all 175 participants). Mentioning 275 participants in one document and 175 participants in another raises doubts about the veracity of the documents.

“How would I know about what the college did or did not do on RTI training…? I cannot give any statement on this. I will need the directors approval to talk on this issue.” - Dr. Rajiv Kumar Shukla, Nodal officer and Incharge of training, Academy.

“Dr. Rajiv Kumar Shukla has been designated as the Nodal officer, and the responsible person to speak to in this regard. I cannot comment on this, he should be able to give you the complete details.” Dr. Sandeep Khanna, Director, Academy.

Monday, September 14, 2009

Raising a Stink over Toilets: Using RTI for Fixing Accountability in the Nirmal Gujarat Campaign

Raising a Stink over Toilets: Using RTI for Fixing Accountability in the Nirmal Gujarat Campaign

The Problem:
The Government of Gujarat spends several crores every year to improve toilet and sanitation facilities for the poorest families in the State. Under the Nirmal Gujarat Campaign launched in 2007 families below the poverty line (BPL) receive partial financial assistance from the government for constructing modern toilets. They are required to contribute a small amount from their own pocket as well. However the scheme is riddled with corruption and does not always work to the satisfaction of the beneficiaries. In March 2008 some of the beneficiaries of this scheme approached Nagarik Adhikar Kendra (NAK) Kalol, Panchmahals district, complaining that the contractor had collected excess amounts from them but had not done much to build functional toilets.

The 1st RTI Intervention:
NAK decided to file an application under the Right to Information Act to obtain copies of the scheme guidelines and records relating to the construction of toilets in Kalol. NAK drafted an RTI request seeking the following information from the Kalol Nagarpalika (municipal body):

1. Name of the nodal agency/department responsible for ensuring the implementation of Nirmal Gujarat scheme;
2. Name of the department/office responsible for actually implementing the scheme in Kalol;
3. Procedure for selection of the contractor/contracting agency responsible for constructing the toilets;
4. Names of the beneficiaries of this scheme and the places where the toilets were constructed;
5. Name and designation of the officer of Kalol Nagarpalika responsible for supervising the construction of toilets;
6. Copy of the no objection certificate (NOC) issued by the Kalol Nagarpalika which enabled the contracting agency to collect payments; and
7. A copy of the completion report submitted by the Kalol Nagarpalika to the Municipal Finance Board which provides funding for this scheme.

When Mr. Hanifbhai Waghela of NAK visited the Nagarpalika office to submit the application he faced resistance. The public information officer (PIO) demanded to know whether he had sworn to create nuisance for the Nagarpalika (NAK has been actively using RTI to hold public authorities accountable for their actions in Panchmahals since 2005). Hanifbhai said that his intentions were honest and he wanted to know about the manner in which the Nirmal Gujarat scheme was required to be implemented. He told him that as a public servant the PIO was required to receive the information request and make a decision regards disclosure. The PIO then threatened to call the police. Hanifbhai replied that police officers were public servants too and he would not feel threatened by their presence. In the end the PIO had little choice but to accept the application. Not doing so would have attracted a monetary penalty under the RTI Act.

Despite the passage of 30 days NAK did not get the information from the Nagarpalika. An appeal was filed before the Additional District Collector, the designated appellate authority (AA) under the RTI Act. The AA heard the matter and ordered that the information be disclosed within 10 days. Despite this order NAK did not receive any information. NAK filed the second appeal with the State Information Commission (SIC) in June. The matter has not been taken up by the SIC despite the passage of 14 months.

The 2nd RTI Intervention:
After submitting the second appeal to the SIC, NAK sent an RTI application to the Municipal Finance Board based in Gandhinagar seeking the same information about the toilet scheme. This Board is responsible for the disbursal of funds to local agencies working in urban areas. After 29 days NAK received a reply from the PIO of the Board who claimed that the requisite application fee of Rs. 20 (less than 50 US cents) had not been paid. This claim was wrong as NAK had filed an application on non-judicial stamp paper worth Rs. 20 - an approved mode of fee payment in Gujarat . NAK filed the first appeal before the AA of the Board and submitted proof of fee payment. The AA ordered disclosure of all information. NAK received all the records and documents 15 days later.

The verification process:
The records NAK received in August 2008 revealed that the government of Gujarat had appointed Manav Seva Khadi Gramodyog Vikas Sangh (MSKGVS), based in Khedbrahma, as the nodal agency for implementing the Nirmal Gujarat Programme. MSKGVS had subcontracted the task to an NGO named Kastruba Mahila Sayak Grih Udoyg Sahakari Sangh Ltd. based in Balasinore in Nadiad district. Armed with the names of beneficiaries contained in the NOC list, NAK started verifying the true state of affairs and captured some images on film. After an intensive door-to-door survey and NAK came up with astonishing findings:

1. Records showed that 150 toilets were required to be constructed in Kalol during the year 2008-09. The Chief Officer, Kalol Nagarpalika had issued a no objection certificate certifying completion of the work for 111 toilets. Payments had been made to the contracting agency.
2. NAK could not find a single instance where the construction work had been completed. In seven places the work had not even begun. In many places three walls had been constructed without a roof but not pit. Scheme guidelines require that a pit of 10ft x 5ft must be dug before the walls are built. The contracting agency claimed that this was a cost effective way of constructing toilets. However the construction work began in some places soon after NAK started the verification process.
3. 16 beneficiaries did not belong to the BPL category at all.
4. None of the toilets had been connected to a sewer.
5. Some of the beneficiaries claimed that their functional toilets had been demolished by the contracting agency in order to construct a fresh one but the work had not been completed. Some families used the half-built cubicle to store firewood.
6. According to the scheme guidelines each toilet was to be constructed at the cost of Rs. 4900. The beneficiary family was required to raise Rs. 900 while the remaining sum was paid by the government. The verification process showed that 74% beneficiaries had paid Rs.1200 and another 5% had paid Rs. 1000. Only 3% of the beneficiaries had paid 900 - the correct amount. 1% of the beneficiaries had paid Rs. 800 and another 13% had paid Rs. 600 only. Where beneficiaries had paid less than the required sum, the construction work had not even begun.
7. The scheme guidelines require that adequate publicity be given to the basics of the scheme so that potential beneficiaries may opt to participate in it. None of the beneficiaries contacted during the verification process said that the contracting agency had shared any information with them about the scheme.

The Advocacy Initiative:
In September 2008 NAK submitted its findings and photographs, illustrative of the poor state of work, to the authorities with a request to investigate the matter and take action against all guilty officials and agencies. Copies of the report were sent to the the Kalol Nagarpalika, Director, Nirmal Gujarat Programme, Shahri Vikas Nigam, the District Collector, the District Planning Committee, the Municipal Finance Board, the Chief Secretary, the Minister for Urban Housing and Development, the Leader of the Opposition, the Chief Minister, and the Governor. None of these authorities even bothered to acknowledge receipt of the report.

Later in October NAK submitted the report as a public grievance to the District Collector and District Magistrate under the Chief Minister Swagat Karyakram. This programme has been initiated for the purpose of handling people’s grievances about the functioning of the administration. The District Collector directed his Deputy to investigate the findings. The Deputy District Collector contacted NAK to assist him. NAK took him around Kalol showing the places where functional toilets were said to have been constructed on paper. The Deputy submitted his report at the monthly meeting of Swagat chaired by the District Collector. The Chief Officer of the Nagarpalika was also present. The Deputy stated openly that NAK’s report was a true statement of facts and he had nothing more to add. The District Collector sought an explanation from the Chief Officer warning him that he risked losing his job and going to jail for issuing NOCs without properly verifying the completion of the work. He had participated in and abetted a fraud. The District Collector ordered him to get all the toilets properly constructed within a month and submit a completion report to him directly.

The Results:
The contracting agency went back to Kalol and rebuilt all the toilets as per scheme norms. Sewer connections have been provided to all the toilets. The excess money collected from the beneficiaries has been returned to them. The government decided to transfer the Chief Officer out of Kalol.

However the Chief Officer continues to serve in the Kalol Nagarpalika as he pulled political strings to get the transfer order cancelled. The government has not moved an inch to fix accountability of any officer nor has the contracting agency been blacklisted.

The Chief Officer recently asked NAK whether it would be able to take up the contract for constructing toilets during the current financial year. Apparently, the previous agency has refused to take up the job this year as working according to the norms of the scheme is not profitable enough. NAK firmly believes in its role as a citizen watchdog over public authorities and has turned down the offer. This indeed is the expectation of the 11th five year plan document which encourages civil society organisations to take on a monitoring role and ensure proper implementation of plan schemes.


- Narrated by Hanif Waghela, Zakir Sheikh and Aslambhai Dewan for CHRI and NAK.

NAK may be contacted at :- Tel: +91-9979644265; email:
nakkalol05@gmail.com

[CHRI has trained NAK to use RTI strategically to hold public authorities accountable for their decisions and actions. CHRI and NAK are collaborating to spread awareness about RTI in Gujarat and monitor compliance of public authorities with their transparency obligations under the RTI Act.]

Monday, August 17, 2009

Proactive Disclosure of non-strategic information- An Initiative of...

Dear all,In June 2009 the President of India stated in her address to the joint session of Parliament that dislcosure of information in non-strategic areas would be improved. While this will be applicable to the Central Government, it is important to take note of a similar initiative launched by the Government of Karnataka from December 2008. A Monthly Programme Implementation Calendar (MPIC) has been designed and disseminated amongst all public authorities to capture the plans and the progress of work regards implementation of various schemes and activities at various level of the State Government.A circular issued by the Chief Secretary, guidelines for filling up the MPIC and various formats to be used including Excel sheets are accessible at: http://finance.kar.nic.in/mpic/planmon.htm The Fiscal Policy Institute in Bangalore is providing backup support to departments to implement this initiative. The scheme was launched under the glare of the media. Compliance has been slow to pick up. The main features of MPIC are given below:Monthly Plan Implementation Calendar in Karnataka:1) Objectives:The Monthly Programme Implementation Calendar (MPIC) is a system intended to facilitate effective and timely implementation of Government’s programmes. MPIC involves detailed planning of important activities which form part of the process of implementation of a programme / scheme and arranging them in appropriate sequence according to a monthwise schedule. The monthwise schedule of activities for the implementation of a programme will help the implementing officers at the state, district, taluk and other levels to take up the programmed activities in a timebound manner according to a planned schedule for optimum results. This will avoid programmes being implemented without adequate preparation, or being unduly delayed. This will also avoid rush of expenditure by government departments towards the end of the financial year. MPIC may be considered as an extension of the Monthly Multilevel Review (MMR) system, which is in operation in the State since the early 1980’s.2) Preparation and Use of MPIC:Apart from indicating the physical and financial targets to be achieved under a programme during different months/parts of a financial year, MPIC will also depict the typical activities to be taken up for implementing the programme every month. Thus, even if no physical or financial targets / milestones are expected to be achieved in a given month, the preparatory activities for achieving the programmed targets during subsequent months are shown in the calendar. The completion or non completion of the activities programmed for every month is reported to enable implementing officers and reviewing authorities to take corrective action on a timely basis so that the targets are achieved within the time allowed for implementing the programme.The MPIC report is to be prepared for every plan scheme including the schemes relating to salaries and other establishment expenditure, and every non-plan scheme excluding the schemes / provisions meant for salaries and office expenses. Thus, plan schemes like Direction and Administration, even though relating to creation of posts and payment of salaries, are included in the MPIC while such items of non-plan expenditure are excluded. Thus, non-plan schemes / programmes like maintenance of buildings, disbursement of scholarships, purchase of medicines, etc., are all included in the MPIC reviews. The MPIC reports are to be submitted strictly complying with the MPIC format as shown in (the Annexures).In typical development departments like Agriculture, Horticulture, Education, Public Works, etc., the responsibility for implementation of programmes goes down to the officers at the Taluk / Sub-division level. The responsibility for reviewing the programmes rests with authorities at the District / Division, State Headquarters / Directorate, and the Secretariat / Ministry levels. Therefore, MPIC formats for most departments are to be prepared separately at the State level by the Head of the Department, at the District / Division level by the District / Division Heads, and at the Taluk / Sub-division level by the concerned implementing officers. In respect of Departments which do not have district / taluk level establishments the Principal Secretaries / Secretaries to Government may specify the authorities including Boards and Corporations which will report progress for MPIC reviews.The progress achieved in the implementation of schemes is to be reported in the MPIC formats by Taluk, District and State authorities in the same manner as in the case of MMR reports. At each level, the progress reported by the lower levels is to be consolidated for review and for reporting to the next higher level. The review of MPIC reports will take place in the Monthly Multilevel Review (MMR) meetings as per the current practice.3) Disclosure of MPIC:The Departments may post MPIC as prepared at the beginning of the year, updated every month with information on progress achieved on their website for public viewing. [A typical MPIC filled up for a specific month is available on the Department of Horticulture website: http://www.horticulture.kar.nic.in/mpic.pdf However the MPIC of this Department for later months is not available on this website. MPIC is not accessible on the websites of a large number of departments and directorates in Karnataka.- CHRI's note]I hope readers will share similar examples from other jurisdictions within and outside India. Andhra Pradesh has a vibrant and working system for proactively disclosing information about the implementation of the National Rural Employment Guarantee Act/Scheme through the Internet. Monitoring compliance with requirements likethe MPIC is the first step towards securing accountability of public authorities.Thanks